नई दिल्ली: स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आजादी का सूत्र बना खादी अब नए दौर में फैशन की एक नई पहचान बनता जा रहा है. विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने की महात्मा गांधी की घोषणा के बाद स्वदेशी आंदोलन के दौरान खादी घर-घर पहुंचा. आरामदेह होने के कारण अब यह अपने अलग अंदाज में युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय होता जा रहा है. लक्षिता फैशन के प्रबंध निदेशक सचिन खरबंदा ने कहा कि खादी अब एक ट्रेंड है और यह एक फायदे का सौदा भी बन गया है. सचिन के अनुसार ‘‘ऑर्गेनिक फैशन मूवमेंट’’ से खादी को काफी लोकप्रियता मिली और अब यह जोर्जेट, शिफॉन और नेट के कपड़े का एक अच्छा विकल्प बनता जा रहा है.


वहीं, कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रोफेसर पत्राली घोष ने कहा कि खादी फैशन से परे है. उन्होंने कहा ‘‘मुझे खादी के कुर्ते और साड़ी पहनना काफी पसंद है.  खादी बेहद अरामदेह भी होता है और निश्चित रूप से इसके साथ हमारा इतिहास भी जुड़ा है. ’’ 


मोटे खादी बुनाई के लिए नया चरखा पेश,बढ़ेगी कारीगरों की आमदनी

खादी और ग्रामोद्योग आयोग केवीआईसी ने मोटे खादी बुनाई के लिए छः और आठ स्पिंडल धुरी वाला चरखा पेश किया है. सूक्ष्म, लघु एवं मंझौले उपक्रम मंत्री गिरिराज सिंह ने हाल ही में अहमदाबाद में नए चरखे का अनावरण किया. इस दौरान खादी और ग्रामोद्योग आयोग के चेयरमैन वी के सक्सेना भी मौजूद रहें. छ: धुरी वाले चरखे का निर्माण अहमदाबाद की खादी प्रयोग समिति ने किया है.

इसकी स्थापना खादी गतिविधियों में तकनीकी उन्नतिकरण के लिए 1958 में की गई थी. चरखा तकनीकी के विकास और शोध के लिए केवीआईसी ने जून में प्रयोग समिति को 15 लाख रुपये दिए थे. विज्ञप्ति के मुताबिक, वर्तमान में मोटे खादी वाले धागे का उत्पादन पारंपरिक एकल-धुरी चरखे से होता है, जो प्रतिदिन केवल चार से पांच हेंक का उत्पादन कर सकता है. 


जिससे कारीगरों को बहुत कम आय होती है. आगे कहा गया है कि नए 6 और 8 धुरी वाला चरखा कम से कम 20 से 25 हेंक प्रतिदिन का उत्पादन करता है. इससे कारीगरों की आय में वृद्धि होगी अर्थात वो प्रतिदिन 200 रुपये या इससे ज्यादा कमा सकते हैं.