अपने भक्तों के कष्ट हरने के लिए शिव समय-समय पर पृथ्वी पर आते हैं। ऐसा ही एक वाकया द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के बाद हुआ। यह युद्ध इतना भीषण था कि इसे समाप्त कराने के लिए स्वयं भगवान शंकर पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। यह युद्ध था स्वयं श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच। आखिर क्यों हुआ यह युद्ध, जानें पूरा प्रकरण…

महाभारत युद्ध के बाद की बात है, महर्षि गालव सुबह के समय स्नान के बाद सूर्य को जल अर्पित कर रहे थे। उसी समय वायु मार्ग से गुजर रहे गंधर्व चित्रसेन का थूक उनकी अंजली में गिर जाता है। इससे महर्षि गालव बहुत क्रोधित होते हैं। वह खुद उसे शाप न देकर दंड दिलाने के लिए श्रीकृष्ण के दरबार में पहुंचे। महर्षि की बात सुनकर उनका आदर करते हुए, श्रीकृष्ण ने 24 घंटे के अंदर चित्रसेन का वध करने का वचन महर्षि को दे दिया।

उधर जैसे ही नारद मुनि को इस बात का पता चला वह, चित्रसेन के पास पहुंचे और उनसे कहने लगे, जो भी दान-पुण्य करना चाहते हो कर लो क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण कुछ ही घंटों में तुम्हें मृत्युद्वार भेजनेवाले हैं। यह सुनकर चित्रसेन घबराए और तीनों लोक में शरण मांगने लगे। लेकिन किसी ने उन्हें अपने यहां शरण नहीं दी। आखिर श्रीकृष्ण से वैर कौन लेता। अंत में गंधर्व अपने परिवार सहित फिर से नारदजी की शरण में लौटे और उन्ही से कोई समाधान देने की विनय की। गंधर्व की विनती पर नारदजी को दया आई और उन्होंने चित्रसेन से कहा कि तुम अपने परिवार सहित आधी रात को इस जगह पर यमुना के किनारे बिलाप करना। एक महिला यहां आएगी, जो तुम्हें विलाप करता देख तुमसे कारण पूछेगी, लेकिन जब तक वह तुम्हारी सहायता का प्रण न ले तुम उसे अपनी समस्या मत बताना। चित्रसेन तैयार हो गए।

फिर नारदजी श्रीकृष्ण की बहन और अर्जुन की पत्नी देवी सुभद्रा के पास पहुंचे और उनसे कहा कि आज बहुत ही शुभ तिथि है। आज मध्य रात्रि में यमुना में स्नान करना और दीन का दुख दूर करने पर अक्षय लाभ की प्राप्ति हो सकती है। इस पर सुभद्रा रात को अपनी दो सखियों के साथ यमुना में स्नान के लिए पहुंची। वहां उन्होंने विलाप करते गंधर्व और परिवार को देखा। तो उन्होंने अक्षय लाभ की इच्छा और मानवता के नाते उनके दुख का कारण पूछा। लेकिन गंधर्व ने तब तक कुछ नहीं बताया, जब तक सुभद्रा ने सहायता का प्रण नहीं किया। लेकिन जैसे ही सुभद्रा ने प्रण किया और गंधर्व ने श्रीकृष्ण के प्रण की बात बताई, सुभद्रा धर्म-संकट में पड़ गईं। उन्हें कुछ नहीं सूझा तो वह गंधर्व को अपने साथ महल ले गईं और जाकर अर्जुन को पूरी बात बताई।

अर्जुन ने कहा, चिंता न करो, अब चित्रसेन हमारी शरण में हैं तो इनकी रक्षा हमारा कर्तव्य है। उधर देव ऋषि नारद श्रीकृष्ण के पास पहुंच गए और उन्हें बताया कि प्रभु आप गंधर्व चित्रसेन को मारने की तैयारी में तो हैं लेकिन स्वयं आपके प्रिय अर्जुन ने उसे अपने संरक्षण में रखा है। इस पर कान्हा नारद मुनि से कहते हैं कि आप जाकर अर्जुन को समझाने का प्रयत्न करें। नारद जी अर्जुन के पास आते हैं और श्रीकृष्ण का संदेश देते हैं। इस पर अर्जुन कहते हैं कि मैं स्वयं श्रीकृष्ण का भक्त हूं और उन्होंने ही मुझे क्षत्रिय का धर्म सिखाया है। मैं उनको समर्पित रहकर ही अपनी शरण में आए व्यक्ति की रक्षा करूंगा।

अर्जुन और श्रीकृष्ण युद्ध भूमि में आमने-सामने होते हैं। भीषण युद्ध होता है। लेकिन न किसी की जीत होती है न किसी की हार। क्योंकि जैसे ही श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र छोड़ा, अर्जुन ने पाशुपात्र छोड़ दिया। इस तरह विष्णु और शिव के अस्त्र आमने-सामने हो गए। अर्जुन ने पाशुपतास्त्र शिवजी की तपस्या करके प्राप्त किया था। प्रलय को भांप महादेव का आह्वान किया। तब भोलनाथ प्रकट हुए और उन्होंने दोनों अस्त्रों के वार को रोक लिया। फिर शिवजी भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और बोले ‘प्रभु आप तो भक्तों के रखवाले हैं। अपने भक्तों की खुशी के लिए वेद, पुराण और शास्त्र के साथ अपनी प्रतिज्ञा को भी भूल जाते हैं। ऐसा तो हजारों बार हुआ है, भगवन अब तो इस लीला का समापन कीजिए।’ तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गले लगाया और युद्ध को विराम दिया।

इस पर महर्षि गालव को बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने तपोबल से चित्रसेन सहित श्रीकृष्ण,अर्जुन और सुभद्रा को जलाकर भस्म करने के लिए आचमनी में जल ले लिया। जैसे ही गालव ने जल लिया सुभद्रा बोल उठीं ‘यदि श्रीकृष्ण के प्रति मेरी भक्ति और अर्जुन के प्रति मेरा प्रेम सत्य है तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर गिरे ही नहीं।’ ऐसा ही हुआ। जल पृथ्वी पर नहीं गिरा और गालव ऋषि ने स्वयं को बहुत लज्जित अनुभव किया। फिर प्रभु को प्रणाम कर वह अपने स्थान को लौट गए।