सुरक्षित गोस्वामी

अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम् |

मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || गीता 9/16||


अर्थ: कर्मकाण्ड मैं हूं, यज्ञ मैं हूं, स्वधा मैं हूं, औषधि मैं हूं, मंत्र मैं हूं, घृत मैं हूं, अग्नि मैं हूं और आहुति भी मैं ही हूं।


व्याख्या: भगवान कह रहे हैं कि इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जहां मैं नहीं हूं। मेरा कण-कण में वास है। इस बात को हवन का एक उदाहरण देते हुए समझा रहे हैं कि वो जो कर्मकांड है, वो मैं ही हूं, उसमें यज्ञ मैं हूं, यज्ञ की लकड़ियां मैं हूं, यज्ञ में डालने वाली औषधियां मैं हूं, फिर जिन मंत्रों के साथ यज्ञ किया जाता है, वो मंत्र भी मैं ही हूं।


यज्ञ में जो घी की आहुति है, वो घी भी मैं हूं, यज्ञ में जो अग्नि है, वो अग्नि मैं हूं और जो आहुति दी जाती है वो भी मैं ही हूं। इतना ही नहीं, यज्ञ करने वाला भी मैं ही हूं और जो यज्ञ का फल है, वो भी मैं ही हूं।