भोपाल। कुपोषण से आए दिन गरीब बच्चों की मौत की खबरें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस मामले में पिछले 10 सालों में मध्य प्रदेश की स्थिति सुधरी है, फिर भी 10 जिलों में अति कुपोषित बच्चों की संख्या हजारों में है। इन बच्चों का स्वास्थ्य सुधारने के लिए सरकार सुपोषण शिविर आयोजित कर रही है, लेकिन स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा। दरअसल, मुफ्त पोषण आहार दिए जाने और पकाने का तरीका बताने के बाद भी लोग इसमें रुचि नहीं दिखा रहे हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों में दिए जा रहे पूरक पोषण आहार लेने में भी लोगों की रुचि नहीं है।


इनमें नियमित रूप से सौ फीसदी उपस्थिति नहीं रह रही है। यही नहीं, आदिवासी अपने बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्रों में भेजने से कतराते भी हैं। यहां कुछ दिन रह भी लिए तो फिर फॉलोअप के लिए नहीं लौटते। महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी मानते हैं कि कुपोषण दूर करने में उनकी योजनाओं में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा अज्ञानता है।


जिन जिलों में अति कुपोषित बच्चे हैं, वहां सरकार की तरफ से सुपोषण शिविर लग रहे हैं। इनमें 10 दिन माताओं को रखा जाता है और उन्हें बच्चों के लिए पोषण आहार बनाने के तरीके सिखाए जाते हैं, लेकिन लोग इस पर पूरी तरह से काम नहीं कर रहे हैं। अफसर यह भी मानते हैं कि कुछ जगह मैदानी अमला भी लापरवाही करता है, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है और पता चलने पर उन पर कार्रवाई भी होती है।


चल रही आठ योजनाएं


गरीब वर्ग के बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए सरकार वर्तमान में आठ योजनाएं संचालित कर रही है। इनमें अटल बाल मिशन, आंगनबाड़ी चलो, विशेष वजन, विशेष पोषण, पंचवटी से पोषण, लालिमा अभियान और सुपोषण शिविरों का आयोजन एवं कृषि से पोषण योजना शामिल है। इनमें से कृषि से पोषण योजना ग्रामीण कृषि व्यवस्था में बड़े बदलाव के लिए लाई गई है। हालांकि इसके परिणाम सामने आने में समय लगेगा


प्रदेश की स्थिति सुधरी


पिछले 10 सालों में मप्र कुपोषण से लड़ने के मामले में बेहतर परिणाम लाया है। अधिकारी बताते हैं कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के परिणाम इसके गवाह हैं। वित्तीय वर्ष 2005- 06 में कराए गए सर्वे में मप्र में 60 फीसदी कुपोषण था, जो 2015-16 के सर्वे में 42.8 फीसदी रह गया है। इस हिसाब से 10 साल में 28.7 फीसदी का अंतर आया है। अब सुपोषण में केरल के बाद मप्र का नंबर आता है।


छह हजार करोड़ रुपए खर्च


कुपोषण को दूर करने में होने वाले खर्च की बात करें, तो राज्य सरकार पिछले पांच साल में करीब छह हजार करोड़ रुपए इस पर खर्च कर चुकी है। इसमें पूरक पोषण आहार पर सबसे ज्यादा 1200 करोड़ रुपए हर साल खर्च होते हैं। यह सीधे तौर पर कुपोषण से नहीं जुड़ा है, लेकिन पूरक आहार देकर ऐसे बच्चों की स्थिति सुधारने की कोशिश तो है।


बिना समर्थन सरकारी प्रयास भी अधूरे, इसलिए हावी


श्योपुर। हरिओम गौड़ कुपोषण का दाग श्योपुर जिले के माथे से नहीं मिट रहा। 20 साल से सरकारें प्रयास करती आ रही हैं, यह प्रयास धरातल तक दिखने भी लगे हैं लेकिन अकेली सरकार कुपोषण को नहीं मिटा सकती। सरकार को इसके लिए कुपोषण से घिरे परिवारांे का जितना समर्थन मिलना चाहिए वह नहीं मिल पा रहा। विजयपुर के झारबड़ौदा गांव की 8 माह की रोशनी को उसकी मां धप्पोबाई ने पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराने से इनकार कर दिया था।


इस बच्ची की गत बुधवार को ग्वालियर में मौत हो गई। यदि, रोशनी को 6 जून को ग्रोथ मॉनीटर व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के कहने पर एनआरसी भेज दिया जाता तो शायद वह आज हमारे बीच होती। इसके बाद गुरुवार को श्योपुर से 22 किमी दूर स्यावड़ी गांव में 17 माह की अतिकुपोषित अरुणा को लेने सुपरवाईजर पहुंची तो बालिका की मां सुनीता ने उसे एनआरसी भेजने से मना कर दिया और कहा कि ''हमारी मोड़ी है मरे तो मर जाए, तुमको क्या लेना-देना है'। इस समस्या से श्योपुर जिला प्रशासन कई साल से जूझ रहा है।


ऐसे-ऐसे हास्यास्पद तर्क भी आते हैं सामने


- श्योपुर में आदिवासी युवा अपनी पत्नी को अकेला नहीं छोड़ते। कई तो एनआरसी में भी नहीं। अफसरों के सामने कई गांव में युवाओं ने कहा कि, एनआरसी से मेरी पत्नी भाग गई या कोई ले गया तो कौन लाएगा उसे।


- आदिवासी महिलाओं में 80 फीसदी से ज्यादा तंबाकूगुटखा खाती हैं। एनआरसी में यह नहीं खाने दिया जाता। कई बार महिलाओं ने शर्त रखी है कि, हमें रोज की एक तंबाकू पुड़िया चाहिए तब एनआरसी में जाएंगे।


- आज भी कई गांवों में आदिवासी कुपोषण को सूखा रोग या दैवीय प्रकोप मानते हैं। झाड़फूंक पर ज्यादा यकीन है। कई बार ऐसे बच्चों को इलाज के नाम पर दागने के प्रकरण सामने आए हैं।