किसी भी कार्य को करने के लिए सर्वप्रथम उसे सीखना और उसके बाद अभ्यास करना जरूरी होता है। कोई भी विद्या सीख तो ली, लेकिन उसका अभ्यास नहीं किया तो सफलता प्राप्त नहीं होती। रसोई बनाना हो या फिर गाड़ी या हवाई जहाज चलाना, तबला और हारमोनियम बजाना हो या गीत गाना- इन सबमें नियमित अभ्यास करना जरूरी होता है। एक छोटा बच्चा एबीसीडी या हिंदी की बारह खड़ी लिखना, बोलना कब सीखता है? जब सैकड़ों बार अभ्यास करता है। चाहकर भी बेटे को अर्जुन से महान नहीं बना पाए द्रोणाचार्य


महाभारत का एक प्रसंग है। गुरु द्रोणाचार्य कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देते थे। उनका बेटा अश्वत्थामा भी शिक्षा ले रहा था। वह चाहते थे कि उनका बेटा अस्त्र-शस्त्र की विद्या में राजकुमारों से आगे रहे। वह राजकुमारों को कुछ समय के लिए बाहर भेज देते और अश्वत्थामा को नई विद्या सिखाते थे। मगर अर्जुन इन सबसे अनजान अपनी साधना में लगे थे। एक रात सब भोजन कर रहे थे कि हवा का एक झोंका आया और दीपक बुझ गया। अर्जुन ने देखा कि अंधेरे में हाथ हर बार थाली के भोजन पर ही पड़ता था और निवाला भी मुंह के भीतर ही जाता था। उसने सोचा कि ऐसा हमारे अभ्यास के कारण ही होता है। दूसरे दिन से अर्जुन ने रात के अंधेरे में चुपचाप बाण चलाने का अभ्यास शुरू कर दिया।


एक रात धनुष की टंकार से द्रोणाचार्य की आंखें खुल गईं तो उन्होंने अर्जुन को अभ्यास करते देख लिया। द्रोण समझ गए कि अश्वत्थामा अर्जुन की बराबरी कभी नहीं कर पाएगा। अपने को पीछे छूटता देख एक बार अश्वत्थामा ने अपने पिता से शिकायत की, ‘पिताजी, हम से ज्यादा आप अर्जुन को चाहते हैं।’ द्रोणाचार्य ने कहा, ‘पुत्र, तुम समझते हो कि शिक्षा देने से ही ज्ञान हासिल होता है, कदापि नहीं। गुरु केवल मार्ग दिखाता है। रास्ते पर चलकर ध्य पाने का कार्य शिष्य का होता है।’ उन्होंने अर्जुन के अभ्यास का जिक्र करते हुए कहा, ‘पुत्र, अर्जुन ने धनुर्विद्या में महारत हासिल कर ली है और उसे कोई पछाड़ नहीं सकता। यह सब कुछ अभ्यास का नतीजा है। यदि किसी भी कार्यक्षेत्र में महारत हासिल करनी है तो अभ्यास पर जोर देना चाहिए।’


कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा, ‘मन बड़ा चंचल, दृढ़ और बलवान है। इसे वश में कैसे कर सकते हैं?’ तब श्रीकृष्ण ने कहा, ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय।’ अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है। यदि प्रवाहित नीर रुक जाए तो वह गंदा होने लगता है और निरतंर प्रवाहित रहे तो स्वच्छ रहेगा। इसी प्रकार साधक को साधना मार्ग में निरंतर चलते रहना है, मतलब दृढ़तापूर्वक अभ्यास करते रहने से परमेश्वर प्राप्ति संभव है। सांसारिक कार्यों को करते हुए ईश्वर का चिंतन हो सकता है यदि दृढ़ता से अभ्यास किया जाए। परिवार, कारोबार त्याग कर नहीं, समस्त कर्म करते हुए ईश्वर चिंतन करके जीवन को सफल करने का बीड़ा उठाएं।