सुरक्षित गोस्वामी


सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता:।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।। गीता 9/14।।


अर्थ: दृढ़ निश्चयवाले भक्त निरंतर मेरा कीर्तन करते हुए, मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए, मुझे बार-बार प्रणाम करते हुए, नित्य मेरे ध्यान में युक्त होकर भक्तिभाव से मेरी उपासना करते हैं।


व्याख्या: जैसे धन को चाहने वाला केवल धन को पाने की चाह करता रहता है, वैसे ही प्रभु का भक्त प्रभु को पाने की चाह में लगा रहता है। वैसे भी जिनका मन संसार के खयालों में न रम कर केवल परमात्मा में स्थित रहता है, वह दृढ संकल्प वाले होते हैं और वही असली भक्त भी होते हैं। फिर ऐसे भक्त निरंतर अपनी वाणी से प्रभु का वर्णन और उनका कीर्तन ही करते रहते हैं, जिससे उनको परमात्मा प्राप्त हो जाएं।


साथ ही वे हर पल प्रभु का शुक्रिया करते हुए बार-बार उनको प्रणाम करते रहते हैं। उनके मन में हमेशा केवल प्रभु का ही ध्यान बना रहता है और वे पूरी भक्तिभाव से परमात्मा की उपासना करते रहते हैं।