नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में राजस्थान से चली धूल भरी आंधी के चलते सांस लेना दूभर हो गया है। सबसे ख़ास बात ये है कि दिल्ली में बीते तीन महीने में एक भी दिन अच्छी एयर क्वालिटी नहीं रही है। दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण का स्तर बुधवार को ख़तरनाक स्तर पर पहुंच गया। 


दिल्ली में PM-10, 824 तक पहुंचा

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों को देखें तो उनके मुताबिक, बुधवार को  PM 10 (पार्टिकुलेट मेटर) दिल्ली में 824 तक चला गया। वहीं दिल्ली-एनसीआर में पीएम 10 बुधवार को 778 के पार गया। दिल्ली में कई जगहों पर एयर क्वालिटी इंडेक्स 500 के पार गया। आनंद विहार में एयर क्वालिटी इंडेक्स 891 पहुंचा गया, जबकि 500 अंकों तक आते-आते ये सीवियर- यानी ख़तरनाक हो उठता है। इसकी वजह राजस्थान में धूल भरी आंधी रही। 


दिल्ली सरकार ने लगाई निर्माण कार्यों पर रोक

हवा के इस खतरनाक स्तर पर पहुंचने के बाद उपराज्यपाल अनिल बैजल ने गुरुवार की दोपहर पर्यावरण मंत्री और अफसरों के साथ बैठक कर यह फैसला लिया कि राजधानी में 17 जून तक निर्माण कार्यों पर पूरी तरह रोक रहेगी। इस दौरान निगम और संबंधित विभाग इस पर नजर रखेंगे। 


सबसे पहले निर्माण कार्यों पर ही क्यों रोक?

अब यह सवाल उठता है कि जब भी प्रदूषण के कारण ऐसी ख़तरनाक स्थिति बनती है और हवा की क्वालिटी इस स्तर पर पहुंचती है तो सबसे पहले निर्माण कार्यों पर ही रोक लगाई जाती है? उसकी ख़ास वजह है। कंसट्रक्शन इंडस्ट्री प्रदूषण का एक बड़ा स्त्रोत है और यह 4 फीसदी पार्टिकुलेट पीएम का उत्सर्जन करता है।


किसी भी इंडस्ट्री की तुलना में सबसे ज्यादा इसी से ही पानी का प्रदूषण होता है। इसके अलावा, हर साल इसके चलते काफी मात्रा में ध्वनि प्रदूषण की शिकायतें आती हैं। हालांकि, इससे मिट्टी भी प्रदूषित होता है लेकिन सबसे बड़ी चिंता इससे होनेवाले हवा, पानी और ध्वनि प्रदूषण है।प्रदूषण में निर्माण कार्यों का कितना योगदान?

 


निर्माण कार्यों से जो प्रदूषण होता है उनमें जमीन की सफाई, डीजल इंजन का चलना, तोड़फोड़, आग जलाना और टॉक्सिक मैटेरियल्स के साथ काम करना शामिल है। सभी तरह के निर्माण कार्यों से काफी मात्रा में धूल बनती है। कंस्ट्रक्शन धूल को पीएम 10 कहा गया है जो 10 माइक्रोन्स से कम होता है और नंगी आंखों से उसे नहीं देखा जा सकता है। 


निर्माण कार्यों के डस्ट से कैंसर का ख़तरा


शोधकर्ताओं के मुताबिक, पीएम 10 लोगों के फेफड़े में पहुंच जाता है और इससे सांस की समस्या, अस्थमा और यहां तक की कैंसर जैसी घातक बीमारी हो जाती है। डीजल के चलते भी कार्बन मोनाक्साइड, हाइड्रोकार्बन्स, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन डायोक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसके अलावा, तेल से निकले विषैले तत्व, थिनर्स, पेन्ट्स, प्लास्टिक्स, तैयार लकड़ी, क्लीनर्स और अन्य खरतनाक कैमिकल जो निर्माण स्थर पर इस्तेमाल किए जाते हैं वह भी हवा प्रदूषण में अपना बड़ा योगदान देते है।


क्या है इसके वैकल्पिक उपाय-

कंस्ट्रक्शन साइट पर कुछ ऐहतियाती उपाय अपनाकर इससे होने वाले प्रदूषण को नियंत्रण कर उससे बचा जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि निर्माण कार्य और उसमें इस्तेमाल होनेवाले मैटिरियल से निकलने वाले प्रदूषण का पहले आकलन किया जाए। उसके बाद कुछ खास कदम उठाकर इन खतरों से निपटा जाए-


-निर्माण स्थलों पर धूल पर नियंत्रण के लिए साइट पर पानी का छिड़काव किया जाए। 

-पूरी साइट का निरीक्षण करें ताकि धूल को फैलने से रोका जा सके।

-कंस्ट्रक्शन मैटिरियल्स से लदे ट्रकों को कवर करके रखा जाए।

-बिल्डिंग मैटिरियल्स जैसे सीमेंट, बालू और अन्य पॉवडर को ढक कर रखा जाए।  उस पर लगातार नजर रखे कि कहीं वह पानी के बहाव में बहकर उधर-उधर तो नहीं जा रहा है।