कोलकाता। सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े कर्जदाता भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को इंसॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड (आइबीसी) की जद में आई कंपनियों से चालू वित्त वर्ष के दौरान करीब 30,000 करोड़ रुपये रिकवरी की उम्मीद है। बैंक के डिप्टी एमडी (स्ट्रेस्ड असेट रिजॉल्यूशन ग्रुप) पल्लव मोहापात्रा ने आइबीसी प्रक्रिया के तहत गुजर रही कंपनियों और उनमें बैंक के एक्सपोजर के बारे में विस्तार से जानकारी दी।


उन्होंने कहा कि आइबीसी की जद में आई दो बड़ी कंपनियों में ही एसबीआई का कुल एक्सपोजर करीब 78,000 करोड़ रुपये है। हाल ही में टाटा स्टील द्वारा भूषण स्टील के अधिग्रहण के मामले में एसबीआइ को करीब 8,500 करोड़ रुपये मिल गए हैं।


मोहापात्रा ने कहा कि इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स और वेदांता के सौदे में बैंक को 6,000 करोड़ रुपये रिकवर होने की उम्मीद है। उनके मुताबिक आइबीसी के अलावा वन-टाइम सेटलमेंट प्रक्रिया, असेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी) के हाथों बिक्री तथा नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) से बाहर के कुछ मामलों से भी करीब 10,000 करोड़ रुपये रिकवरी का लक्ष्य लेकर चल रहा है। बैंक का कुल फंसा कर्ज (एनपीए) 2.20 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।


मोहापात्रा ने कहा, 'जितना भी एनपीए है, उसकी पहचान हो गई है। हम 100 फीसद रिकवरी की उम्मीद नहीं कर रहे हैं। हालांकि बैंक के लाभ पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि एनपीए के मद में पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं।'


आइबीसी का मकसद कंपनी की बिक्री नहीं, बल्कि समाधान-


इन्सॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (आइबीबीआइ) के चेयरमैन एम. एस. साहू ने शनिवार को कहा कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड (आइबीसी) के तहत आ रहे मामलों का बुनियादी मकसद उन कंपनियों को चलने लायक बनाना है, उनके दाम बढ़ाकर उन्हें बिकने लायक बनाना नहीं।


उन्होंने कहा कि समाधान प्रक्रिया के तहत आ रही कंपनियों को सभी साझेदारों के हित में चलाते रहने लायक बनाना आइबीसी की आत्मा में है। इसके लिए सफल समाधान प्रक्रिया की जरूरत है। हालांकि साहू ने उद्योग जगत की संस्था सीआइआइ में कहा कि वर्तमान में ऐस्रा होता दिख नहीं रहा है।


लेकिन उनका कहना था, 'हमारा मकसद समाधान प्रक्रिया को सभी साझेदारों के हित में कंपनी को चलाते रहने लायक बनाना है। लेकिन ऐसा तभी हो सकता है, जब रिजॉल्यूशन की कीमत कंपनी की लिक्विडेशन की कीमत से ज्यादा हो।