रायपुर। गाय-भैंस में खुरहा-चपका बीमारी (एफएमडी) की रोकथाम के लिए 16 मई से शुरू हुए मुफ्त टीकाकरण अभियान अधर में लटक गया है। क्योंकि प्रदेशभर में टीकाकरण की जिम्मेदारी संभाल रहे प्राइवेट एआइ कर्मचारियों को पिछले दो वर्ष से मानदेय नहीं मिला है।


इससे कर्मचारियों ने गरियाबंद, बिलासपुर, भैंसा क्षेत्रों में टीकाकरण का बहिष्कार कर दिया है। वहीं छह जून तक चले टीकाकारण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पीएआइडब्ल्यू कर्मचारियों की मानें तो सघन टीकाकरण कार्यक्रम का शेड्यूल विपरीत रहा है। 40 से 43 डिग्री तापमान में टीकाकरण से गाभिन और छुट्टा पशुओं को काफी दिक्कत होती है।


गाभिन पशुओं के लिए खतरा


गाभिन होने की वजह से कई लोग पशुओं का टीकाकरण कराने से मना कर देते हैं। जून में अधिकांश गाय-भैंस गाभिन रहती हैं। प्राइवेट एआई कार्यकर्ता संगठन के अध्यक्ष रामगोपाल यादव ने बताया कि टीकाकरण से एक तरफ जहां दूध कम हो जाता है, वहीं गर्भपात की आशंका अधिक होती है। इसलिए विभाग का यह दावा कि शत प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य पूरा हो रहा है, भ्रामक है।


खुले पशुओं को टीकाकरण नहीं


एफएमडी टीकाकरण की योजना खासकर छत्तीसगढ़ के भौगोलिक परिवेश में इस वक्त शतप्रतिशत नहीं हो सकता। रायपुर नगर निगम में 24 हजार से अधिक गाय, भैंस, बैल आदि हैं। इसमें 30 फीसद पशु बंधे होते हैं, बाकी खुले घूमते हैं। इन पशुओं के टीकाकरण में काफी दिक्क्तें आती हैं। यही दिक्कत अन्य मैदानी इलाकों में होती है, जहां इस मौसम में अधिकतर पशु खुले घूमते हैं।


छह जून तक टीकाकरण


प्रदेश में खेती-किसानी तथा दूध के लिए लोग पशुपालन करते हैं। खुरहा-चपका से दुधारू पशुओं की दूध देने की क्षमता प्रभावित होती है। वायरल रोग होने के चलते पशुओं की मौत हो जाती है। राज्य शासन के पशुधन विकास विभाग द्वारा हर वर्ष एफएमडी सघन टीकाकरण अभियान चलाया जाता है। इस संबंध में जानकारी लेने के लिए पशुचिकित्सा सेवाएं के संचालक डॉ. एसके पाण्डेय के मोबाइल नंबर पर कई बार कॉल किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।