हम सभी जानते हैं तुलसीदासजी ने महर्षि वाल्मीकि जी की लिखित रामयण का प्रकरांतर से अवधी में भाषांतर किया था, जिसे समस्त उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। तुलसीदासजी अपनी पत्नी रत्नावली से बहुत प्रेम करते थे। एक बार इनकी पत्नी मायके गई हुई थीं तो तुलसीदास वर्षा ऋतु में घनघोर अंधेरी रात में जब मूसलाधार बरसात हो रही थी अपनी पत्नी से मिलने के लिए चल दिए। रास्ते में उफनती नदी पड़ती थी। नदी में एक तैरती लाश को नाव समझ कर नदी पार कर गए। लेकिन जब पत्नी के पास पहुंचे तो पत्नी ने कहा जितना प्रेम इस हाड़-मांस के देह से है उतना अगर श्रीराम से होता तो जीवन संवर जाता। पत्नी के मुंह से इतना सुनते ही तुलसीदासजी का मोह भंग हो गया और वह उलटे पांव वहां से राम की तलाश में निकल चले।

उज्जैन के प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के भाई का नाम राजा भतृहरी था। राजा भर्तहरि की तीन पत्नियां थीं और वह सबसे ज्यादा अपनी तीसरी पत्नी पिंगला से प्रेम करते थे। कहते हैं पिंगला इसका फायदा उठाकर व्यभिचारिणी हो गई। पिंगला घुड़साल के रखवाले से प्रेम करने लगी। इस बात की जानकारी छोटे भाई राजा विक्रमादित्य को लग गई। पिंगला के चरित्र के बारे में विक्रमादित्य ने कई बार भर्तृहरि को बताया लेकिन उन्होंने विश्वास नहीं किया। बरसों बाद एक फल के द्वारा पिंगला के बनावटी प्रेम के बारे में भर्तृहरि को पता चला। इसके बाद उन्होंने स्त्री और संसार से दूरी बना ली। उन्होंने गुरु गोरखनाथ से दीक्षा ले ली और वह राजा से साधु बन गए।


संत सूरदास के बारे में अनेक कथाएं हैं। एक कथा यह भी है कि सूरदासजी जन्म से अंधे नहीं थे, उनके बचपन का नाम मदन मोहन था। वह एक स्त्री से प्रेम करते थे। एक दिन बहुत तेज तूफान आ रहा था लेकिन प्यार में व्याकुल मदन मोहन उस स्त्री से मिलने चले दिए। उस स्त्री ने जब इन्हें अपने घर के नीचे बैठा देखा तो अपनी मां को सब हाल बता दिया। स्त्री की माता ने इन्हें घर में बुलाया और जिनसे यह प्रेम करते थे उसे एक पूजा की थाली लेकर इनके पास भेजा। स्त्री की माता ने कहा आप हमारे अतिथि हैं आपकी कैसे सेवा करें। इस बात से मदन-मोहन बहुत लज्जित हुए और एक सूई मंगवाई। सूई इन्होंने अपनी आखों में भोंक लिया। इन्होंने कहा कि इसी दृष्टि के कारण मुझसे पाप हुआ है और वह श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हो गए।

कालिदास को महामूर्ख मानकर इनकी पत्नी विद्योत्तमा ने इन्हें घर से निकाल दिया। एक दिन इनपर मां काली की ऐसी कृपा हुई कि यह महामूर्ख से संत और महाकवि बन गए और रच डाले महाकाव्य।


रसखान कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि थे। वह भगवान के सगुण और निर्गुण निराकार रूप दोनों के प्रति श्रद्धावान थे। एक बार की बात है कृष्ण भक्ति से पहले वह एक बनिए की लड़की से प्रेम करते थे। एक दिन इन्होंने किसी से यह कहते हुए सुन लिया कि भगवान से ऐसा प्रेम करना चाहिए, जितना रसखान बनिए की लड़की से करता है। यह सुनकर वह बहुत लज्जित हो गए और भगवान की शरण में चले गए। ऐसी भी कथा है कि बनिए की लड़की ने इन्हें घर से यह कहकर भगा दिया था कि मुझसे जितना प्रेम करते हो उतना भगवान से करो तो जीवन सुधर जाए। इस बात से दुनिया से इनका मोह भंग हो गया और वह संत बन गए।