रावण एक बार कैलाश पहुंचा। द्वार पर नंदीश्वर को देखकर वह उनसे पराक्रम की डींग मारने लगा। नंदीश्वर ने कहा- ''भैया! तुम भी शिवलिंग के पूजक हो और मैं भी। अंतः हम दोनों समान हैं। पारक्रम तो हमारे अाराध्य का प्रसाद है। अभिमान पूर्वक क्यों डींग मारते हो?''


रावण- ''तुम मेरे समान शिव के आराधक हो, तब तुम्हरा मुख वानर समान क्यों है?''नंदीश्वर- भगवान महेश्वर तो मुझे अपना सारूप्य प्रदान कर रहे थे, किंतु सेवक का स्वामी को समक्ष होना उचित नही है। यह सोचकर मैंने वानर का मुख मांगा। मेरे आशुतोष प्रभु ने प्रसन्न होकर मेरी बात स्वीकार कर ली। इससे अपने में अभिमान शून्यता बनी रहती है। निरभिमान, दम्भरहित, निष्परिग्रह जन ही शिव को प्रिय हैं। आभिमानी, दम्भी, परिग्रही व्यक्ति हमारे सर्वेश्वर की कृपा से वंचित रह जाते हैं। रावण- ''तुम्हें वानर मुख क्या मिला, वानर बुद्धि हो गई। मुर्ख हो तुम, बुद्धिमान तो मैं हूं। मैंने शिव से उनसे दोगुने मस्तक मांगे। इन दश मुखों से उनकी भली प्रकार की स्तुति की जा सकती है।''

नंदीश्वर ने इस उपहास से क्रोधित होकर शाप दे दिया- ''तुम मेरे मुख का उपहास करते हो, अतः जब कोई महातापस पुरूषोत्तम वानरों के साथ तुम पर आक्रमण करेंगे तब वे निश्चय ही तुम्हारा वध कर देंगे। तुम्हारे ये सब सिर भू-लुण्ठित होंगे।''


नंदीश्वर के शाप से खिन्न रावण लंका लौट गया।