आचार्य लोकेशमुनि

जीवन में धूप-छांव, हर्ष-विषाद, उतार-चढ़ाव का क्रम चलता रहता है। जीवन की विषम स्थितियों में दिक्कतों को झेलने में वही समर्थ होता है, जिसकी जड़ें गहरी हैं। हर आदमी को यह चिंतन करना है कि जड़ मजबूत कैसे हो? केवल पत्तों पर, फूलों पर इतराएं नहीं। ऊपर की ऊंचाई ही नहीं, नीचे की गहराई भी अपेक्षित है। लेकिन प्रकृति का नियम कुछ ऐसा है कि कुछ आंखों के सामने आता है और बहुत कुछ आंखों से ओझल रहता है। फूल, पत्ते और फल तो दिखाई देते हैं, जड़ दिखाई नहीं देती। जो दिखाई देता है, उसकी तो पूछ-परख होती है, और जो दिखाई नहीं देता, छिपा रहता है, उसे कोई पूछता भी नहीं।


जो व्यक्ति वर्तमान में नहीं बल्कि आने वाले भविष्य में अधिक जीता है, वह अनावश्यक ही तरह-तरह की दिक्कतों से घिरा रहता है। वर्तमान में जीना कई समस्याओं का समाधान है। ‘आगे-पीछे, अच्छा-बुरा, कम ज्यादा’ जैसे शब्द हमें चैन से बैठने नहीं देते। इन शब्दों को जितना तवज्जो देते हैं, उतना ही दूसरों के बनाए जाल में उलझते जाते हैं। जबकि सच यह है कि हर व्यक्ति की अपनी क्षमताएं होती हैं और अपने हालात। न ही हम अपने हालात से भाग सकते हैं और न ही हर समय दौड़ लगा सकते हैं। फिर भी दूसरों से आगे निकलने की होड़ बनी ही रहती है। पीछे रह जाने का दुख सालता रहता है और इस तरह आगे बढ़ने या फिर से वापसी की हमारी कोशिश कई उम्मीदों का बोझ साथ लिए चलती है। हमारी यात्रा में बोझ जितना ज्यादा होता है, चाल उतनी ही धीमी हो जाती है।


लियॉन ब्राउन ने कहा है कि जिस दिन आप भविष्य की चिंता करना बंद कर देंगे, वह आपके नए जीवन का पहला दिन होगा। जीवन में कुछ लोग आते हैं और कुछ लोग बिछड़ जाते हैं। कुछ प्रेम में पड़ते हैं और कुछ प्रेम की राह छोड़ देते हैं। कुछ लोगों को उपहार मिलते हैं तो कुछ लोगों को नई चुनौतियों का सामना करने को मिलता है। कोई दिन बेहतर जाता है तो कोई बेहद खराब। पर हर दिन की नई शुरुआत करनी चाहिए- नई सोच, नई ऊर्जा, नए विचारों, नए लक्ष्यों और नए संकल्पों के साथ। बीते अनुभव से सीख लें और आगे बढ़ जाएं।


जीवन की धूप-छांव और आंख-मिचौली के यथार्थ को हम समझें। स्वयं को उसके लिए मानसिक रूप से तैयार करें। जो धर्म और अध्यात्म की चेतना के संपर्क में हैं, उन्हें तो भविष्य के अनावश्यक बोझ से स्वयं को मुक्त रखना ही चाहिए। जब जिंदगी सही चल रही होती है तो हर चीज आसान लगती है। वहीं थोड़ी सी गड़बड़ होने पर हर चीज कठिन। या तो सब सही या सब गलत। संतुलन बनाना हमारे लिए मुश्किल होता है। लेखक जेम्स बराज कहते हैं, ‘आज में जियें। याद रखें कि वक्त कैसा भी हो, बीत जाता है। अपनी खुशी और गम दोनों में खुद पर काबू रखें।’