मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् |

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || गीता 9/10||


अर्थ: हे अर्जुन ! मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चराचर जगत को रचती है और इसी कारण संसार चक्र घूम रहा है।


व्याख्या: उपनिषद में कहा है कि परमात्मा ने संकल्प किया कि ‘मैं एक हूं और अनेक रूपों में प्रकट हो जाऊं’ और इसी भाव से शांत प्रकृति में हलचल शुरू हुई और धीरे-धीरे संपूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना हो गई। मूल प्रकृति से जब चर और अचर जगत की रचना हो रही थी, तब परमात्मा की अध्यक्षता में ही सबकुछ व्यवस्थित तरीके से रचा गया।


मानव शरीर की रचना के परफेक्शन की तरह पूरे जगत को बड़ी बारीकी व परफेक्ट तरीके से रचा गया। यह परफेक्शन इसलिए था, क्योंकि परमात्मा की अध्यक्षता थी। उस समय यह भी निर्धारित हो गया था कि यह संसार चक्र अपने आप एक व्यवस्था के तहत चलता रहेगा और यह सृष्टि चक्र घूमता रहेगा।