आजर कैवां फारस के शाही खानदान से थे। बाद में वह पारसी धर्म के मशहूर संत बने। इनका ज्यादातर वक्त भारत में गुजरा। बिहार में योग परंपरा और ध्यान दर्शन पर आजर कैवां ने खूब काम किया। यह भी कह सकते हैं कि उनके कारण ही पारसी धर्म की एक शाखा पल्लवित हुई। इस्लाम से निकला सूफिज्म जब आजर तक पहुंचा तो उन्होंने इसका खूब विस्तार किया, साथ ही अपने पारसी धर्म को भी बचाए रखा।


एक बार उनके पास साधुओं का एक झुंड आया। उस झुंड में जितने भी साधु थे, उन्होंने पूरी तरह से भौतिक दुनिया से नाता तोड़कर ईश्वर की साधना का मार्ग चुन लिया था। फिर भी उनके मन में कुछ उलझनें चल रही थीं। परेशान होकर वह आजर के सामने आकर बैठ गए। उनके चेहरों को देखकर आजर ने पूछा, ‘भला साधुओं को क्या गम हो सकता है?’ उनमें से एक बूढ़ा साधु बोला, ‘हम बहुत बड़े घरों से थे। हमारे पास जिंदगी गुजारने की सब प्रकार की सुविधाएं थीं। हमने वह सब छोड़कर इधर का रुख किया।’ आजर खुश हुए और बोले कि फिर फिक्र किस बात की है?


साधु बोले, ‘हमारे पास न तो कमंडल है, न माला है, न गुदड़ी है और न ही संतों वाला आसन…।’ वह बोल ही रहे थे कि उन्हें रोकते हुए आजर कैवां खुद बोल उठे, ‘भाई, तुम तो संसार को छोड़कर भी संसार में फंसे हुए हो। फकीरी तो हर चीज के मोह को छोड़ने में है न कि उन्हें पाने की ख्वाहिश में। आपका दिल अब भी दुनिया की चीजों में फंसा हुआ है। आप सभी लौट जाइए और समाज में रहकर ईश्वर को याद करते हुए भजन-पूजन कीजिए। फकीरी अभी आपके बस का नहीं है।’ आगे आजर ने कहा, ‘जो भी संसार के किसी मोह में फंसा रह जाएगा, वह कभी भी फकीर नहीं हो सकता।’