रायपुर। रमजान महीने की इबादतों में से एक अजीम इबादत नमाजे भी तराबीह है,जो सिर्फ इसी महीने पढ़ी जाती है। अमूमन ये 20 रकात की नमाज होती है, जो रात में ईशा की नमाज के बाद ऐसे इमाम के पीछे पढ़ी जाती है, जो हाफिजे कुरान होता है, यानि जिसे पूरा कुरान हिफ् (याद) होता है।


ये नमाज 20 रकात की होती है, जो दो-दो रकात करके पढ़ी जाती है और हर चार रकात के बाद कुछ वक्त बैठ कर तराबीह की दुआ पढ़ी जाती है ' मुक़द्दस कुरान ए करीम का पढ़ना और सुनना भी सवाब है और तराबीह की नमाज में मुकद्दस कुरान शुरू से आखिर तक पढ़ा और सुना जाता है।


ज्यादातर मस्जिदों में कुराने करीम शब-ए-कद्र की मुकद्दस शब में खत्म कर खत्मे कुरान की दुआ पढ़ी जाती है तो कुछ जगह पर लोग जमा होकर तराबीह की नमाज सात दिनों या 10 दिनों में भी खत्म कर देते है, मगर नमाजे तराबीह रमजान के पूरे महीने यानि ईद का चांद दिखने के पहले तक पढ़ी जाती है।


क्या नबी ए करीम मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमो तराबीह पढ़ी है


अक्सर कुछ लोगो के जहन में ये सवाल आता है, जो कि नहीं आना चाहिए, क्योंकि आका नबी-ए-करीम की इबादतों का तो हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते है। हदीसों के हवाले से जो बाते मालूम हुई वो इस तरह है कि इस मुबारक महीने में आक़ा ए करीम हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कसरत से घर में भी और घर से बाहर भी इबादत किया करते थे।


एक बार अल्लाह के प्यारे नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रात में घर से बाहर आकर नमाजे तराबीह पढ़ रहे थे, वहां जो सहाबा मौजूद थे, वे नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पीछे इस इबादत में शामिल हो गए, दूसरे दिन नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम घर से बाहर आकर फिर यही नमाज पढ़ी।


पहले से भी कही ज्यादा तादाद में सहाबा शरीक हुए और तीसरे दिन भी नबी ए करीम हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इसी तरह नमाज पढ़ी और सहाबा और ज्यादा तादाद में जमा होकर नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पीछे नमाज पढ़ी, और चौथे दिन तो ये चर्चा हर तरफ हो चुकी थी, लिहाजा कसीर तादाद में सहाबा जमा हो गए, मगर नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उस रात बाहर तशरीफ नहीं लाये, सहाबा इंतजार करते रहे, यहाँ तक की नमो फज्र का वक्त करीब आ गया तो नबी ए करीम स.अ.व.बाहर तशरीफ लाये और सहाबा से कहा मुझे पता है आप सब यहाँ जमा है।


इसके बावजूद मैं इसलिए बाहर नहीं आया कि मेरी ये नमाज ओर मेरी ये इबादत कही मेरी उम्मत पर फर्ज न हो जाये और मैं नहीं चाहता कि इसे पूरा करने में मेरी उम्मत को दुश्वारी हो, 'जिससे मालुम हुआ कि अगर नबी ए करिमैन अगर पूरे महीने इस नमाज को पढ़ाते तो अल्लाह इस नमाज को भी र्फ में शुमार कर देता। ' जिन सहाबियों ने तीन रात हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पीछे नमाज-ए-तराबीह पढ़ ली हो और मेरे आक़ा से कुराने करीम की तिलावत सुनी हो उनका क्या कहना।


लिहाजा इसके बाद से ही सहाबा अलहदा या फिर किसी हाफिजे कुरआन के पीछे ये नमाजे पढ़ते रहे 'इसके बाद हजरत उमर रजिअल्लहुताला अन्हु के दौर में जब रमजान में एक रात वो मस्जिद में तशरीफ लाये और लोगों को अलग-अलग नमाज ए तराबीह पढ़ते हुए पाया तो फरमाया मैं मुनासिब जानता हूँ कि इन सबको एक इमाम के साथ जमा कर दूँ तो बेहतर हो।


और उन्होंने सब को एक इमाम उबई इब्ने कअब के साथ इकट्ठा कर दिया, फिर दूसरे दिन तशरीफ ले गये तो देखा कि लोग अपने इमाम के पीछे नमाज पढ़ रहे हैं तो फरमाया यह बहोत ही अच्छी बिदअत है। और इस तरह नमाजे तराबीह पढ़ना हजरत उमर के दौर से जिस तरह शुरू हुआ तो वैसे ही आज भी चला आ रहा है, इसलिए इसे सुन्नतुल तराबीह कहा जाता है और माहे रमजान में इसे अदा करना जरूरी होता है।'