इच्छा, आशा, अपेक्षा, आकांक्षा- ये ही हमारे समाज की चालक शक्तियां होती हैं। इच्छाएं ही हमारे जीवन की व्याख्या भी करती हैं। कुछ पाने से आती सफलता या कुछ न पाने से आती विफलता ही हमारा परिचय होती हैं। इच्छाओं और आशाओं में रचे-बसे हमारे समाज में अधिकतर लोग इन्हें नहीं मार पाते। उनकी इच्छाएं उन्हें मृग की तरह दौड़ाती रहती हैं। परंतु यही इच्छाएं जब टूटती हैं, तब कई बार वहीं से ज्ञान की किरण मनुष्य के हृदय में प्रवेश करती है।


अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम क्या-क्या नहीं करते। यदि इच्छाओं के विषय में सोचने लगें तो तय है कि उनका कोई अंत नहीं। एक पूरी की तो दूसरी पैदा हो जाती है। इस तरह से उन्हें पूरा करते-करते जीवन बीत जाता है। अपनी भावनाओं को पल भर के लिए रोक कर सोचिए कि जन्म से लेकर अब तक आपने जीवन में क्या किया है? केवल और केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति? इन्हीं को पूरा करने में समय बीता जा रहा है और ये इच्छाएं भी समय के अनुसार बदलती जा रही हैं। मनुष्य समझता है कि इच्छाओं की पूर्ति से ही वह खुश रहेगा। इसी को लक्ष्य बनाकर वह प्यासे मृग की तरह पानी की तलाश में कभी यहां, कभी वहां घूमता रहता है। परंतु होता यह है कि अंत तक प्यासा ही रह जाता है।


जीवनभर हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए क्यों तत्पर रहते हैं? हमारी इच्छाएं क्या आज तक पूरी हुई हैं? जीवन का रहस्य ही यही है कि हम जिसे पाना चाहते हैं, उसे हम नहीं पा पाते हैं। जिसके पीछे हम दौड़ते हैं, वह हमसे दूर हटता चला जाता है। जिसके लिए हम प्रार्थनाएं करते हैं, वह हमारे हाथ के बाहर हो जाता है। जीवन करीब-करीब ऐसा ही है, जैसे मुट्ठी में हवा को बांधने की कोशिश। जितनी जोर से मुट्ठी कसते हैं, उतनी ही हवा मुट्ठी के बाहर हो जाती है। खुली मुट्ठी में हवा होती है, बंद मुट्ठी में हवा नहीं होती। ऐसे ही जीवन को जो लोग जितनी आकांक्षाओं में बांधना चाहते हैं, जीवन उतना ही हाथ के बाहर हो जाता है। अंत में सिवाय रिक्तता, विषाद के कुछ भी हाथ नहीं लगता है। कृष्ण कहते हैं, ‘मुट्ठी खुली रखो मुट्ठी। स्वयं को आकांक्षाओं या इच्छाओं से मत बांधो। जीओ, लेकिन फल मिलने की इच्छा हेतु नहीं। ’


सवाल उठता है कि बिन आशा फिर जीवन क्यों? कृष्ण कहते हैं, जीना अपने में ही आनंद है। इच्छा खुद में ही दुख है। जैसे जीवन को अपना आनंद लेने से कोई नहीं रोक सकता, वैसे ही इच्छा को भी दुख देने से कोई नहीं रोक सकता। यह हमारे ऊपर है कि हम क्या चुनते हैं। आनंद की ओर जाना है तो इच्छाओं को तनिक विराम देकर देखिए।