एक घर को आगे बढ़ानेवाला सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा किचन होता है। वास्तुशास्त्र में घर के हर हिस्से के बारे में कुछ बातें बताई गई हैं, जिन्हें मानने से घर में शांति और सभी सदस्य दिनी-दूनी रात चौगुनी उन्नति करते हैं। ऐसे भी मनुष्य के लिए भोजन उसी प्रकार है, जिस प्रकार किसी मशीन को चलाने के लिए तेल। तो चलिए, जानते हैं ऐसे ही कुछ वास्तु टिप्स जो आपके परिवार में सदैव खुशहाली बनाए रख सकते हैं…

भारतीय संस्कृति में अग्नि को काफी पूजनीय व महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके साथ ही अग्नि भोज्य पद्धार्थ को सुपाच्य के साथ ही विषाणुरहित भी बनाता है। इस प्रकार वास्तुशास्त्र में भोजन के सही स्थान को लेकर काफी बातें बताई गई हैं। दरअसल अग्नि से संबंधित कार्य को करने के लिए वास्तुशास्त्र में आग्नेय कोण को उपयुक्त बतलाया गया है। इसे अग्नि देवता का स्थान माना गया है, ऐसे भी बिना अग्नि के भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

शास्त्र में अग्निकोण की एक विशेषता यह भी है कि शुक्र ग्रह इसका स्वामी है। जिस कारण से शुक्र भोजन को विविध रूप में तैयार करने में भी सहायक माना गया है। जिससे परिवार शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक रूप से मजबूत बनता है। दरअसल जो किचन आग्नेय कोण में बनी होती है, वहां अग्नि के साथ-साथ सूर्यदेव की भी कृपा प्राप्त होती है। क्योंकि ऐसे उदयकालीन सूर्य की किरणें आपको मिलती हैं, जो भोजन को भी पौष्टिक बनाती हैं।

वास्तु के अनुसार, भोजन पकाते समय हमेशा आपका मुख पूर्व दिशा में रहे तो इसे शुभ माना गया है। दरअसल ऐसे उस दिशा की सकारात्मक ऊर्जा आपको प्राप्त होती है और आप अपना काम बेहतर कर पाते हैं। हालांकि ईशानकोण में किचन का निर्माण बिल्कुल निषेध माना गया है। इसे जल का क्षेत्र माना जाता है और अग्नि व जल परस्पर शत्रु हैं तो ऐसे में घर में मानसिक तनाव, धन हानि, वंश वृद्धि में कमी, पारिवारिक कलह जैसी समस्याएं देखने में आती हैं।

इसके साथ ही नैर्ऋत्य कोण में जो किचन बना होता है वहां रहनेवाले हमेशा बीमार रहते हैं, अग्नि से दुर्घटनाओं का भय और जन-धन की हानि भी हो सकती है। जबकि वायव्य कोण में यदि किचन बनानी पड़ जाए तो निर्माण इस तरह का होना चाहिए कि भोजन बनानेवाला का मुख पूर्व की ओर रहे। वरना दक्षिण की ओर मुख करके भोजन बनाने से वहां की नकारात्मक ऊर्जा भोजन बनानेवाले को अशांत व असंतुलित कर सकती है, जिससे कार्य में विघ्न पैदा होते हैं।

शास्त्र के अनुसार, ऐसे आप उत्तर-पश्‍चिम की ओर किचन का स्टोर रूम, फ्रिज और बर्तन आदि रखने की जगह बना सकते हैं। दक्षिण-पश्‍चिम भाग में गेहूं, आटा, चावल आदि अनाज रखें। हमेशा ध्यान रखें कि किचन के बीचोंबीच कभी भी गैस, चूल्हा आदि नहीं जलाएं और न ही रखें। वहीं डाइनिंग रूम भी हमेशा पूर्व या पश्‍चिम में होना चाहिए। इसे दक्षिण दिशा में बनाने से बचने का प्रयास रखना चाहिए।

मान्यताओं के अनुसार, रसोई में तीन चकले कभी न रखें, इससे घर में क्लेश हो सकता है। इसके साथ ही किचन में हमेशा गुड़ रखना सुख-शांति का प्रतीक माना गया है। टूटे-फूटे बर्तन भूलकर भी उपयोग में कभी न लाएं, ऐसा करने से घर में अशांति का माहौल बना रहता है। किचन में कभी किसी बात को लेकर रोना नहीं चाहिए, ऐसा करने से अस्वस्थता बढ़ती है। वहीं उत्तर मुखी रसोई खर्च ज़्यादा करवाती है।

अगर किसी कारणवश आपको किचन आग्नेय या वायव्य कोण को छोड़ अन्य क्षेत्र में बनवाना पड़ जाए तो, कम से कम वहां का चूल्हा आग्नेय या वायव्य कोण की तरफ़ ही होना चाहिए। इसके साथ ही किचन की पवित्रता व स्वच्छता किसी मंदिर से कम नहीं होनी चाहिए। ऐसा करने से मां अन्नपूर्णा की कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी। ऐसे किचन निर्माण के लिए दक्षिण-पूर्व क्षेत्र सबसे उत्तम है, किन्तु जहां सुविधा न हो वहां विकल्प के रूप में उत्तर-पश्‍चिम क्षेत्र का प्रयोग भी किया जा सकता है। मगर उत्तर-पूर्व मध्य व दक्षिण-पश्‍चिम क्षेत्र का सदैव त्याग करना चाहिए।