नई दिल्ली। निर्वासित जीवन जी रही मशहूर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपने शव को मेडिकल रिसर्च के लिए एम्स को दान देने का फैसला किया है। उन्होंने मंगलवार को ट्वीट कर यह जानकारी दी। अपने ट्वीट के साथ तस्लीमा ने एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ एनॉटमी की डोनर कार्ड स्लिप की तस्वीर भी साझा की है।


वहीं, तस्लीमा नसरीन के इस ट्वीट पर लोगों ने जमकर प्रतिक्रिया दी है। 56 वर्षीय तस्लीमा नसरीन महिलाओं से जुड़े मुद्दों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे पर काफी मुखर रही हैं।


इसके चलते वह कट्टरपंथियों के निशाने पर भी रहती हैं। इसी वजह से उन्हें साल 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। साल 1962 में बांग्लादेश में जन्मी तस्लीमा नसरीन पेशे से एक फिजीशियन हैं। उन्होंने 32 साल की उम्र में लज्जा नाम का उपन्यास लिखा था।


इसमें अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों (हिंदुओं) पर हुए अत्याचारों का वर्णन किया गया था। इसे लेकर बांग्लादेश में उन्हें मारने का फतवा जारी कर दिया गया था। इसके बाद तस्लीमा नसरीन साल 1994 में बांग्लादेश छोड़कर स्वीडन में बस गईं थी।


तस्लीमा के पास स्वीडन की नागरिकता भी है। साल 2005 में तस्लीमा भारत लौटी और तब से यहीं पर निर्वासित जिंदगी जी रही हैं। उनका वीजा हर साल बढ़ाया जाता है। पिछली बार जून 2017 में भी उनका वीजा एक साल के लिए बढ़ाया गया था।