अपने जमाने के महान सूफी संत हसन के पास एक बार एक व्यक्ति आया और बोला, ‘मुझे आप जीवन का सार बताइए, मैं जीवन दर्शन का इच्छुक हूं।' यह सुन संत हसन ने जवाब दिया कि ‘यहां से थोड़ी दूर एक कब्रिस्तान है, वहां जाओ और कब्रों में सोए लोगों पर पत्थर फेंककर व गालियां देकर आओ।’ उस व्यक्ति ने वैसा ही किया, जैसा कि संत हसन ने कहा था। तब हसन उससे पुनः बोला कि ‘अब तुम फिर उस कब्रिस्तान में जाओ और अबकी बार कब्रों पर मोमबत्तियां जलाकर  दुआ मांग कर आओ।’ यह सुन वह व्यक्ति असमंजस में पड़ गया। उसने संत हसन से कहा, ‘अभी आपने कब्रों पर पत्थर फिकवाए, मुरदार लोगों को गालियां दिलवाईं। अब आप मोमबत्तियां जलाने और दुआ करने को कह रहे हैं। आप तो पागल मालूम होते हैं ।’ हसन बोले, ‘जैसा कहा है, वैसा ही करो।” वह व्यक्ति कुछ सोचकर पुनः कब्रिस्तान गया। उन्हीं कब्रों, पर जिन पर कुछ समय पूर्व वह पत्थर फेंक आया था, उसने मोमबत्तियां जलाई और दुआएं कीं। जब वह हसन के पास लौटा, तो वह बोले, ‘मुझे बताओ जब तुमने कब्रों में सोए लोगों पर पत्थर फेंके व गालियां दीं, तो उन्होंने कुछ कहा’ उस व्यक्ति ने नहीं मैं सिर हिला दिया। इसके बाद उन्होंने उससे फिर पूछा कि 'जब तुमने मोमबत्तियां जलाई व खुदा से दुआऐ मांगी।’ उस व्यक्ति ने पुनः नहीं का उच्चारण किया। इसके बाद हसन बोले, ‘यही जीवन का सार और दर्शन है। प्रत्येक व्यक्ति को सुख-दु:ख में एक समान रहना चाहिए।’