नई दिल्ली ।  अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया खासी उथल-पुथल भरी होती है। यहां एक के बाद एक चुनौतियां दस्तक देती रहती हैं। पहले से ही अस्थिरता के भंवर में फंसे दुनिया के सबसे हलचल भरे इलाकों में से एक पश्चिम एशिया अब एक नई चुनौती से दो-चार होने जा रहा है जिसका असर भारत को भी झेलना पड़ेगा। जैसी आशंका जताई जा रही थी, वैसा ही तब हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ अमेरिकी समझौते को एक झटके में खत्म करने का एलान कर दिया। ईरान के साथ परमाणु समझौते से जुड़ी संयुक्त व्यापक कार्ययोजना जेसीपीओए के नाम से मशहूर है।


इस समझौते पर अरसे से तलवार लटकी हुई थी जिसे 120 दिनों की समीक्षा के बाद ट्रंप ने गिरा ही दिया। उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस और यूरोपीय शक्तियों द्वारा कुछ खामियों को दुरुस्त करने के प्रस्ताव की भी परवाह नहीं की। यह कोई छिपी हुई बात नहीं कि पिछले कुछ समय से ट्रंप ईरान के साथ परमाणु समझौता खत्म करने की फिराक में थे। उनके इस एलान से पहले यूरोपीय नेताओं ने उन्हें समझाने की भरसक कोशिश की। इस कवायद में ब्रिटिश विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन ने यह दलील भी दी कि अमेरिका और ब्रिटेन के राजनयिक फ्रांसीसी और जर्मन साथियों के साथ मिलकर ईरान को लेकर ऐसी सहमति पर काम कर रहे हैं जिसमें यह तय किया जाएगा कि तेहरान क्षेत्रीय तनातनी न बढ़ा पाए और उसके मिसाइल कार्यक्रम पर अंकुश लगाने के साथ यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वह कभी परमाणु बम नहीं विकसित कर पाए।

शायद वह इस बात को लेकर आश्वस्त हो गए कि कोई भी वैकल्पिक योजना और भी बदतर होगी। जॉनसन का बयान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों और जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल के अमेरिकी दौरे के एक दिन बाद ही आया। मैक्रों और मर्केल भी यही समझाने के लिए अमेरिका गए थे। यूरोपीय नेताओं की तमाम समझाइश के बाद भी ट्रंप पिघले नहीं और इस समझौते को बेहूदा ही बताते रहे। समझौते को लेकर उनकी आलोचना मुख्य रूप से इस बिंदु पर केंद्रित थी कि मौजूदा समझौता केवल एक तय अवधि के लिए ही ईरान की परमाणु गतिविधियों पर बंदिश लगाता है और उसमें बैलिस्टिक मिसाइलों पर अंकुश लगाने का कोई प्रावधान नहीं। ऐसी राय रखने वाले वह अकेले नहीं। इजरायल ने भी इस पर आपत्ति जताई और कुछ ‘गोपनीय परमाणु फाइलों’ का हवाला देते हुए कहा कि ईरान 2003 के पहले तक परमाणु बम पर काम कर रहा था और उसने वह तकनीक छिपा ली है।


इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान पर सीरिया को अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति का आरोप भी लगाया। इस पर हैरत नहीं कि ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने ट्रंप को चेतावनी दी कि अगर वह तेहरान के साथ परमाणु करार को रद करते हैं तो यह ऐतिहासिक भूल होगी। ईरान में जेसीपीओए के आलोचकों का भी यह कहना है कि अमेरिका ईरान पर लगातार अपना शिकंजा कस रहा है। वित्तीय प्रतिबंधों से लेकर ईरानियों और ईरानी

बैंकों के साथ लेनदेन करने वालों पर अरबों डॉलर के आर्थिक हर्जाने का डर दिखाया जा रहा है। खराब होते आर्थिक परिवेश को लेकर बढ़ते असंतोष ने रूहानी सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। वहां आम जनमानस में बढ़े आक्रोश के चलते शासन के भीतर कट्टरपंथी धड़ों को मजबूती मिली है।

ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर नेतन्याहू के दावे को झूठ करार देते हुए कहा कि उन्होंने पुराने आरोपों को ही नए सिरे से पेश किया है जबकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए के साथ पहले ही उनका समाधान निकाल लिया गया है। इस सबके बीच अमेरिका में ईरान के खिलाफ घरेलू भावनाओं में उबाल आता गया। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपेओ ने कहा कि इजरायली प्रधानमंत्री द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज पूरी तरह दुरुस्त हैं। उन्होंने यही दर्शाया कि 2015 का ईरान के साथ समझौता झूठ पर आधारित था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर जॉन बोल्टोन की नियुक्ति भी सत्ता के रुख में आए बदलाव का संदेश देने के लिए ही है।


ईरान को लेकर अमेरिकी फैसले का जितना असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा उसकी उतनी ही तपिश नई दिल्ली में भी महसूस की जाएगी। भारत दुनिया में तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और पिछले साल भारत को तेल आपूर्ति करने वाले देशों में ईरान तीसरे पायदान पर था। अगर ट्रंप सचमुच जेसीपीओए से मुकरते हैं तो भारत एक बार फिर दबाव में आ जाएगा कि वह ईरान पर अपनी तेल निर्भरता घटाए। एक तरह से समझौते से पहले वाले दौर की ही वापसी हो सकती है। जेसीपीओए के अमल में आने से भारत को दक्षिणपूर्व ईरान में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह को विकसित करने का अवसर मिला। यह ईरान का इकलौता बंदरगाह है जिससे रूस और यूरोप के साथ उसके व्यापार में तेजी आई है।


जेसीपीओए के ठंडे बस्ते में जाने के बाद चीन ईरान में और आक्रामक तरीके से अपना दांव लगाएगा। यह भारत के लिए और मुश्किल भरा साबित होगा। इससे उसके विकल्प और सीमित हो जाएंगे। तेहरान से रिश्तों को लेकर नई दिल्ली पर पड़ने वाला दबाव न केवल चाबहार के भविष्य पर असर डालेगा, बल्कि खासी एहतियात के साथ तैयार की गई भारत की पश्चिम एशियाई कूटनीति को भी प्रभावित करेगा। मोदी सरकार ईरान, इजरायल और अन्य अरब देशों के साथ अपने रिश्तों को बेहतर बनाने में एक बड़ी हद तक इसीलिए कामयाब रही, क्योंकि ईरान के साथ समझौते ने ईरान और पश्चिम के बीच तनाव को घटाने का काम किया था।


हाल के दौर में भारत और ईरान के बीच कुछ तनाव भी बढ़ा। इनमें फरजाद-बी ऑयलफील्ड को रूसी कंपनी गैजप्रोम को देने और चाबहार में भागीदारी के लिए चीन और पाकिस्तान को आमंत्रित करने के संकेत जैसे उदाहरण शामिल हैं। फिर भी दोनों के रिश्ते उसी गति से सामान्य भी हुए। अब उन पर ट्रंप के फैसले से खतरा मंडराने लगा है। हालांकि संभावित खतरों से निपटने के लिए भारत ने भी कुछ एहतियाती कदम उठाए हैं जैसे भारतीय कंपनियों को ईरान में रुपये में निवेश करने की इजाजत देना ताकि ईरान में भारतीय परियोजनाओं को सुरक्षा कवच मिले। इसकी कीमत अनुमान से कहीं ज्यादा हो सकती है।


यही वजह है कि इस साल की शुरुआत में रूहानी की भारत यात्रा के दौरान भारत ने जेसीपीओए के पूर्ण एवं प्रभावी क्रियान्वयन में सहयोग का आश्वासन दिया था। इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का भी समर्थन हासिल था जिसे परमाणु अप्रसार और अंतरराष्ट्रीय शांति, स्थायित्व और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण योगदान माना गया। नई दिल्ली को यही उम्मीद होगी कि ट्रंप के झटके के बावजूद यूरोपीय देश ईरान समझौते के पक्ष में खड़े रहेंगे ताकि भारत पर इसका बहुत ज्यादा असर न पड़े, लेकिन हलचल भरे इस दौर में उम्मीद की डोर पर्याप्त मजबूत नहीं।