कर्नाटक चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी ने मध्यप्रदेश में भले ही फिर से सत्ता में आने के लिए ताल ठोंक दी हो. लेकिन सपा और बसपा की सक्रियता के चलते बीजेपी का 82 सीटों पर समीकरण कुछ बिगड़ता हुआ नजर आ रहा है.


मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते हर छोटा बड़ा दल अब अपने-अपने दांव चल रहा है. चाहे गठबंधन की बात हो या फिर जोड़-तोड़ की राजनीति. हर कोई किसी भी तरीके से सत्ता को हासिल करना चाहता है. प्रदेश में मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच है लेकिन बसपा और सपा बीजेपी का चुनावी गणित बिगाड़ सकते हैं.


सूत्रों ने बताया कि दोनों ही पार्टियों ने कांग्रेस को बाहर से समर्थन दिया है. ऐसे में उन सीटों पर सपा और बसपा की नजर हैं, जो दलित बहुल्य क्षेत्रों की हैं या फिर रिजर्वेशन वाली. विपक्ष में बैठी कांग्रेस, सपा और बसपा का सहयोग लेकर बीजेपी को हराने की चाल चल रही है. हालांकि, कर्नाटक चुनाव के परिणाम के बाद बीजेपी प्रदेश में भी जीत का दावा कर रही है और वहीं कांग्रेस नेता सपा और बसपा समेत क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन हासिल कर बीजेपी की सफाया करने की बात कह रहे हैं.


सूत्रों ने बताया कि बसपा और सपा की राजनीतिक प्लानिंग भावने के बाद बीजेपी 'सबका साथ-सबका विकास" के नारे के साथ जातिगत समीकरण साधने पर काम कर रही है. बीजेपी की तरह कांग्रेस भी सपा और बसपा की प्रभावित वाली सीटों पर कब्जा करने की रणनीति बना चुकी है. सपा के खाते में पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं थी, जबकि बसपा के खाते में चार सीटे आईं थी.



मप्र में इन सीटों पर बसपा का है प्रभाव

सुमावली, जौरा, वारासिवनी, सबलगढ़, दिमनी, अंबाह, मुरैना, भिंड, महाराजपुर, पन्ना, गुन्नौर, रामपुर बघेलान, सेमरिया, देवतालाब, रीवा, कटंगी, अटेर, लहार, सेवढ़ा, दतिया, पिछोर, करेरा, पोहरी, कोलारस, चंदेरी, मुंगावली, अशोक नगर, बीना, खुरई, बंडा, चंदला, बिजावर, मलहरा, खरगापुर, टीकमगढ़, जतारा, पृथ्वीपुर, पवई, चित्रकूट, सतना, रेगांव, नागौद, मैहर, अमरपाटन, चुरहट, धौहनी, सिंहावल, ब्योहारी, सिरमोर, त्योंथर, मऊगंज, गुढ़, बहोरीबंद, बड़वारा, विजयराघवगढ़, चितरंगी, देवसर और सिंगरौली.


पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बसपा ने ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, रीवा और सतना जिलों में दो से लेकर सात सीटों पर जीत हासिल की है. लेकिन भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, टीकमग़़ढ, छतरपुर, पन्ना, दमोह, रीवा, सतना की कुछ सीटों पर दूसरे स्थान पर रहकर पार्टी ने अपनी ताकत दिखाई थी.


राज्य में तीसरी प्रभावशाली बहुजन समाज पार्टी का वोट प्रतिशत और वोट दोनों ही घटे हैं. बसपा को 2008 के चुनाव में 22 लाख 62119 वोट मिले थे, लेकिन 2013 चुनाव में उसके एक लाख 34160 वोट घट गए और उसे 21 लाख 27959 वोट मिले. प्राप्त वोटों के हिसाब से बसपा को 5.93 प्रतिशत और कुल मतों के हिसाब से 2.68 प्रतिशत का नुकसान हुआ.


बसपा को पिछले चुनाव में 8.97 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2013 में उसे 6.29 प्रतिशत मत हासिल हुए है. बसपा की सीटें भी सात से घटकर चार रह गई हैं. इसी तरह समाजवादी पार्टी के वोटों और हिस्सेदारी के प्रतिशत में भी गिरावट आई. वह 2008 बार जीती एकमात्र सीट भी गंवा बैठी और 2013 में वह खाता तक नहीं खोल पाई. सपा को 2008 में पांच लाख 1324 वोट मिले थे, जो 2013 में करीब 20 प्रतिशत घटकर चार लाख 4846 रह गए. कुल मतों के हिसाब से उसे 2008 में 1.99 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे जबकि 2013 में कुल मतों में उसकी हिस्सेदारी 1.19 प्रतिशत ही रह गई.


प्रदेश में दलित हिंसा के बाद अल्पेश ठाकोर का ओएसएस एकता मंच पहले से कांग्रेस के लिए काम कर रहा है. ऐसे में बसपा और सपा के असर वाली सीटों के जरिए इस बार सत्ता में आने की पूरी प्लानिंग कर चुका है. ये प्लानिंग अमित शाह के प्लान के आगे कितनी ठीक पाएगी, ये प्रदेश के विधानसभा चुनाव के परिणाम से सबसे सामने आ जाएगा.