नई दिल्ली। सरकार ने एक बार फिर थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई की दर (डब्ल्यूूपीआइ) का आधार वर्ष बदलने की तैयारी शुरू कर दी है। सरकार अब थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई की दर के आकलन के लिए 2017-18 को आधार वर्ष बनाने जा रही है।


सरकार का मानना है कि इससे मुद्रास्फीति की अधिक वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। बताया जा रहा है कि वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय ने इस पर काम भी शुरू कर दिया है। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक साल 2017-18 को आधार वर्ष बनाने के लिए डब्लूपीआइ के इंडेक्स में भी संशोधन किया जा रहा है।


इसमें कुछ नए उत्पादों के शामिल होने की संभावना है। सूत्र बताते हैं कि मैन्यूफैक्चर्ड उत्पाद श्रेणी में अधिक बदलाव संभव हैं। नए उत्पादों की पहचान के लिए जल्द ही एक कार्यदल के गठन की उम्मीद है।


सरकार ने बीते साल मई में ही थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई की दर का आकलन करने के लिए आधार वर्ष बदलकर 2011-12 किया था।


फिलहाल डब्ल्यूपीआइ के सूचकांक में विभिन्न श्रेणियों के तहत 69 उत्पाद रखे गए हैं। इन श्रेणियों में प्राइमरी आर्टिकल्स, फ्यूल एंड पावर और मैन्यूफैक्चर्ड प्रोडक्ट शामिल हैं। माना जा रहा है कि आधार वर्ष बदलने की प्रक्रिया पूरी होने में करीब 24 महीने का वक्त लगेगा।


डब्ल्यूपीआइ का आधार वर्ष बदलने के साथ-साथ सरकार ने एक प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआइ) लाने की तैयारी भी पूरी कर ली है। इसके अगले महीने लांच होने की संभावना है।


सूत्रों के मुताबिक इस इंडेक्स में प्रायोगिक तौर पर दस सेवाओं को शामिल किया गया है, जिसमें टेलीकॉम और रेल सेवाएं भी शामिल हैं।


इनके अतिरिक्त बैंकिंग, डाक, बीमा, बंदरगाह, परिवहन और हवाई यात्रा से जुड़ी सेवाएं भी इसमें रहेंगी। सरकार के इस प्रयोग से इन क्षेत्रों में भी महंगाई का आकलन करने में सुविधा होगी।


वर्तमान में देश में उत्पादों की कीमतों में बदलाव का आकलन करने के लिए दो तरह के सूचकांकों का इस्तेमाल होता है। एक थोक मूल्यों पर आधारित है और दूसरा खुदरा मूल्यों पर आधारित है।


डब्ल्यूपीआइ के जरिये थोक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव पर नजर रखी जाती है, जबकि सीपीआइ में खुदरा बाजार में कीमतों में होने वाली उठापटक पर नजर रखी जाती है।


डब्ल्यूपीआइ और सीपीआइ में कर भार भी शामिल होता है। पीपीआइ में निर्माताओं या उत्पादकों के लिहाज से कर भार शामिल होगा।