नई दिल्ली: दुनिया के 2 सबसे बड़े कंज्यूमर देश होने के बाद भी कच्चे तेल की खरीद में भारत और चीन को तेल उत्पादक अरब देशों की मनमानी सालों से झेलनी पड़ रही है। इन्हें न केवल तेल की कीमतों पर ऊंचा प्रीमियम चुकाना पड़ता है बल्कि देश में एनर्जी की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं लेकिन अब भारत और चीन ने तेल का बड़ा बाजार होने का फायदा उठाकर ही ओपेक देशों पर पलटवार करने का मन बना लिया है। 


एक्सपर्ट्स का मानना है कि दोनों देशों की कम्बाइंड बास्केट साइज इस स्थिति में है कि तेल की कीमतों पर ओपेक देशों की दादागिरी खत्म कर सके। ऐसा होता है तो न केवल दोनों देशों की बैलेंस शीट सुधरेगी बल्कि करोड़ों लोगों को एनर्जी के लिए ऊंची कीमतें देने से भी छुटकारा मिलेगा। यानी तेल सस्ता हो सकता है। 


चुकानी पड़ रही अतिरिक्त कीमत

भारत और चीन जैसे एशियाई देशों को अमरीका और यूरोपीय रिफाइनर्स की तुलना में पश्चिम एशियाई क्रूड उत्पादक देशों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। एशियन प्रीमियम के नाम पर एशियाई देश तेल के बदले प्रति बैरल 6 डालर ज्यादा कीमत देते हैं। यह प्रीमियम यूरोप और दूसरे वैस्टर्न कंट्रीज को नहीं देना पड़ता। भारत एशियन प्रीमियम हटाने की मांग लंबे समय से उठा रहा है। भारत की यह भी मांग है कि एशियाई देशों की कीमत पर यूरोपीय देशों को सबसिडी देना गलत है, सबके लिए एक नियम होना चाहिए। 


बास्केट साइज की ‘पावर’ का मिलेगा फायदा 

केडिया कमोडिटी के डायरैक्टर अजय केडिया का कहना है कि भारत और चीन का क्रूड के मसले पर साथ आना कंज्यूमर के लिहाज से सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। ओपेक और नॉन-ओपेक संघ जहां प्रोडक्शन से रिलेटेड है वहीं भारत और चीन का यह संघ कंज्यूमर रिलेटिड है। उनका कहना है कि ये दोनों देश मिलकर दुनिया के 17 प्रतिशत कच्चे तेल की खपत करते हैं। ऐसे में इनके कम्बाइंड बास्केट साइज की इतनी पावर है कि यह बारगेडनिंग कर सकते हैं। दोनों देशों का रिजर्व बेस मजबूत होता है तो तेल की खरीद के लिए ये मोल-भाव कर पाएंगे।