शांति, शांति, शांति तीन बार शांति कहने से मन मस्तिष्क को शांति मिलती है, यह शास्त्रों में वर्णित शब्द है, लेकिन शांति को पाने के लिए तीन बार शांति कह देना मात्र पर्याप्त नहीं है। शांति एक संस्कार है, एक वैचारिक शक्ति है, एक स्थिर अनुभूति है, जिसे प्राप्त करने के लिए संघर्ष, आत्मनियंत्रण व आत्मशक्ति की जरूरत पड़ती है। सचमुच में आप आंतरिक ऊर्जा व शांति प्राप्त करना चाहते हैं तो याद रखें ये अनमोल सूत्र -



आप चेष्टा करें कि यथासंभव सात्विक भोजन ही करें। तामसिक भोजन मन मस्तिष्क को अस्थिर करता है। मांस, मदिरा, अंडा इत्यादि के सेवन से शारीरिक वासना चरम बिंदु पर पहुंच जाती है, इससे मन अस्थिर हो जाता है।



तामसिक भोजन रक्त पिपासा को बढ़ाता है। आप लाख कोशिश करें मगर आपको तामसिक भोजन की आदत लग जाने पर आपकी जीभ मांस का स्वाद ही चाहेगी और आपकी मनोवृत्ति विकृत होगी, शांति नष्ट होगी।



सुख-दुख, योग-वियोग किसी के भी जीवन में आते-जाते रहते हैं, इसलिए कोई भी चीज सदा के लिए हमारी नहीं रहती। हम भी सदा के लिए धरती पर नहीं रह पाते। हमें अपने ज्ञान को उजागर कर शांति पानी होगी।



हम अगर अपने अंदर ईर्ष्या, द्वेष, बर्बरता, निष्ठुरता, छींटाकशी जैसे दुर्गुणों को पनपाते हैं, तो हम स्वत: अशांति की ओर खिंचते चले जाते हैं। मन: स्थिति को काबू में नहीं रख पाते हैं, इसलिए भावनाओं को नियंत्रण में रखना पहले से ही प्रारंभ करना चाहिए। दुर्गुणों को दबाकर सद्गुणों को उभारना चाहिए, शांति आएगी।



हम ईर्ष्या, द्वेष से दूसरों को चोट पहुंचाते हैं, दूसरों के मन को अशांत करते हैं। मगर हमारी इस तरह की गतिविधियों का सैंकड़ों गुना बुरा असर हम पर पड़ेगा, हम अशांत होकर भटकते रहेंगे।