अगर आपके पास दमदार स्टार्स और एक शानदार स्क्रिप्ट है तो कम बजट में भी आप एक ऐसी फिल्म बना सकते हैं जो दर्शकों को बांधकर रखने का दम रखती है। वैसे इस फिल्म के बैनर और प्रॉडक्शन टीम ने इससे पहले सौ करोड़ के बजट में भी फिल्में बनाई हैं, लेकिन इस बार करीब पौने दो घंटे की ऐसी तीन कहानियों को जो बेशक एक ही जगह से शुरू होती है, लेकिन हर पल तीनों कहानियों का अंदाज़ और इनका सब्जेक्ट पूरी तरह से बदल जाता है। करीब पांच करोड़ से भी कम बजट में बनी इस फिल्म से अर्जुन मुखर्जी ने डायरेक्शन की फील्ड में एंट्री की है, लेकिन अपनी पहली ही फिल्म में उन्होंने साबित कर दिया कि ग्लैमर इंडस्ट्री में उनका सफर काफी लंबा चलना तय है। मुंबई के एक इलाके के एक चॉल के इर्द-गिर्द घूमती इस फिल्म की तीनों कहानियों का क्लाइमैक्स आपको चौंकाने का दम रखता है। बेशक चॉल में रहने वाले फिल्म के इन किरदारों का आपस में एक रिश्ता बना हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे खिसकती है, वैसे-वैसे यह सभी किरदार एक-दूसरे से काफी जुदा नजर आते हैं। 

कहानी : मुंबई के माया नगर इलाके की एक चॉल में अधेड़ उम्र की विधवा फ्लोरी मेडोसा (रेणुका शहाने) को अपना घर बेचना है, लेकिन फ्लोरी का यह मकान इसलिए बिक नहीं पा रहा है कि फ्लोरी को अपने इस मकान की प्राइस पूरे 80 लाख चाहिए। कई ब्रोकर इस मकान के खरीददार लेकर आते हैं लेकिन कीमत सुनते ही कस्टमर गायब हो जाते हैं। इस बार हैदराबाद से मुंबई में अपना डायमंड जूलरी का बिजनेस जमाने आया यंग बिज़नसमैन सुदीप (पुलकित सम्राट) इस मकान को खरीदने के लिए आया है। सुदीप करीब 20 लाख रुपए की कीमत वाले इस पुराने मकान को 80 लाख में खरीदने की डील फाइनल कर लेता है। आखिर सुदीप ने एक साधारण चॉल के छोटे से मकान की चार गुणा प्राइस क्यों दी, यही इस कहानी का क्लाइमैक्स है। दूसरी कहानी वर्षा (मसुमेह मखीजा) और शंकर वर्मा (शरमन जोशी) की है। इसी चॉल में अपने करीब 7 साल के बेटे के साथ वर्षा अपने शराबी पति के साथ रहती है जो अक्सर उसकी पिटाई करता है। वर्षा खुद कमाती है और पति दिन भर घर पर रहता है। इसी चॉल में वर्षा की सहेली सुहानी भी रहती है, जिसका पति दुबई में बिज़नस के लिए गया हुआ है। वर्षा अक्सर सुहानी से अपनी आपबीती बयां करती है, सुहानी का हज्बंड शंकर वर्मा जब दुबई से वापस लौटता है तब वर्षा और शंकर के पुराने रिश्तों की एक अलग कहानी सामने आती है। तीसरी कहानी रिजवान (दधि पांडे) की है, उसकी चाल में रोजमर्रा के सामान का स्टॉल है। रिजवान का जवान बेटा सुहेल (अंकित राठी) इसी स्टॉल को संभालता है , सुहेल चॉल में रहने वाली मालिनी (आएशा अहमद) से प्यार करता है। दोनों एक-दूसरे को बेइंतहा चाहते हैं, लेकिन मालिनी की ममी और सुहेल के अब्बा को किसी भी सूरत में इनकी शादी कबूल नहीं है। इन कहानियों के बीच लीला (रिचा चड्डा) भी दिखाई देती है और लीला ही इन तीनों कहानियों को अंजाम तक पहुंचाती है। 

अगर ऐक्टिंग, स्क्रीनप्ले, डायरेक्शन की बात करें तो ऐक्टिंग के मापदंड पर तीनों स्टोरीज दमदार है। लंबे अर्से बाद स्क्रीन पर लौटी रेणुका शहाणे की ऐक्टिंग इस फिल्म की यूएसपी है, रेणुका के काम की जितनी तारीफ की जाए कम है। पुलकित सम्राट इस बार अपने रोल को ईमानदारी के साथ निभाने में कामयाब रहे। शरमन जोशी, मसुमेह मखीजा, अंकित राठी, आएशा अहमद हर किसी ने अपने किरदार को दमदार ढंग से निभाया। वहीं रिचा चड्डा का बदला अलग अंदाज आपको पसंद आ सकता है। यंग डायरेक्टर अर्जुन मुखर्जी की कहानी और किरदारों पर अच्छी पकड़ है। गाने बेवजह फिट किए गए जो कहानी की रफ्तार को धीमा करने का काम करते हैं। रेणुका शहाणे की शानदार ऐक्टिंग, कसी हुई स्क्रिप्ट और लीक से हटकर बनी यह फिल्म उन दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरने का दम रखती है जो रोमांटिक, मसाला , ऐक्शन फिल्मों की भीड़ से अलग कुछ नया देखना चाहते है, तो इस फिल्म को देख सकते हैं।