शुक्रवार दि॰ 09.03.18 को चैत्र कृष्ण प्रदोष व्यापीनी अष्टमी को कालाष्टमी पर्व मनाया जाएगा। शिवपुराण के अनुसार इसी दिन मध्यान्ह में रुद्रावतार भैरव उत्पन्न हुए थे, इसी कारण इसे कालाष्टमी पर्व कहते हैं। पौराणिक मतानुसार अंधकासुर ने अधर्म की सीमा लांघ ली थी। घमंड में चूर अंधकासुर ने महादेव पर आक्रमण करने का दुस्साहस कर दिया। अंधकासुर के संहार हेतु रुद्र के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। एक प्रचलित किंवदंती के अनुसार पूर्व में ब्रह्मा पंचमुखी थे व ब्रह्मा पंचम वेद की रचना भी कर रहे थे। इसी विषय पर महादेव ने ब्रह्मा से वार्तालाप की परंतु न समझने पर महाकाल से उग्र, प्रचंड भैरव प्रकट हुए व उन्होंने नाखून के प्रहार से ब्रह्मा का पांचवा मुख काट दिया, इस पर भैरव को ब्रह्महत्या का पाप लगा। 



एक और किंवदंती के अनुसार कालांतर में ब्रह्मा ने महादेव की वेशभूषा पर उनका उपहास किया। उसी समय रुद्र के शरीर से क्रोध में लिप्त प्रचण्ड दण्डधारी भैरव प्रकट होकर ब्रह्मा के संहार हेतु आगे बढ़ा। यह देख ब्रह्मा भय से चीख पड़े। महादेव ने उन्हें शांत कर उन्हें महाभैरव का नाम दिया। महादेव ने भैरव को काशी का नगरपाल बनाया। भैरव ने इसी तिथि पर ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट किया था। लोग इस दिन काल अर्थात मृत्यु भय मुक्ति हेतु भैरव पूजन करते हैं। 



शुक्रवारीय चैत्र कलाष्टमी पर भैरव के उमानंद स्वरूप के पूजन का विधान है। इनका पूजन अबीर व इत्र से करते हैं। उमानंद भैरव के विधिवत व्रत, पूजन व उपाय से दांपत्य संबंध मधुर होते हैं, प्रेम में सफलता मिलती है, गुप्त रोगों का निदान होता है।



पूजन विधि: घर की वायव्य दिशा में गुलाबी वस्त्र पर भैरव का चित्र स्थापित करके विधिवत पूजन करें। सुगंधित तेल का दीप करें, गुलाब की अगरबत्ती से धूप करें, गुलाबी फूल चढ़ाएं, अबीर चढ़ाएं, इत्र चढ़ाएं, मीठे चावल का भोग लगाएं तथा इस विशेष मंत्र  का 1 माला जाप करें। पूजन के बाद भोग कुत्ते को खिलाएं।



पूजन मुहूर्त: शाम 16:15 से शाम 17:15 तक। 

पूजन मंत्र: ॐ उमानंद भैरवाय नमः॥ 



उपाय

गुप्त रोगों के निदान हेतु दही-शक्कर के घोल में अपनी छाया देखकर कुत्ते को खिलाएं।



मधुर दांपत्य संबंध बनाने हेतु भैरव पर चढ़ा इत्र बेडरूम में छिड़कें।



प्रेम में सफलता हेतु प्रेमी का नाम लेते हुए चमेली के तेल का पंचमुखी दीपक रात्रि में चौराहे पर जलाएं।