परमात्मा हर पल व हर जगह हमारे अंग-संग है परंतु हमारा अहंकार और हमारी अज्ञानता हमें उसे देखने ही नहीं देते। समाज में रहते हुए हमें अनेक काम करने पड़ते हैं। हमारी जाति, हमारा काम-धंधा, हमारा सामाजिक रुतबा, हमारी धन-दौलत, हमारी वास्तविक पहचान नहीं हैं बल्कि ये सब हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। 



जब हम इनको अपनी पहचान बना कर चलते हैं तो ये ही हमारी रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन जाते हैं। अज्ञानता के कारण हम इन्हीं बातों को अपनी पहचान का आधार बना लेते हैं और इन्हीं के सहारे अपने जीवन को सफल करने की कोशिश करते हैं। 



जब हमने किसी से कोई काम करवाना हो तो भी हम अक्सर अपनी धन-दौलत, अपनी ऊंची जाति अथवा अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के बल पर दबाव डाल कर बात करते हैं। यह हमारी बहुत बड़ी भूल है।



यह एक सामान्य बात है कि समाज में रहते हुए हमारी धन दौलत, हमारी ऊंची जाति, हमारा सामाजिक रूतबा अथवा अच्छे लोगों के साथ हमारे संबंध हमारे अंदर अहंकार पैदा कर देते हैं और यही अहंकार लेकर जब हम महापुरुषों के पास जाते हैं तो हम अपेक्षा करते हैं कि वे हमें तत्काल जीवन भेद बताकर आत्मज्ञान दे दें, परंतु ऐसा नहीं होता।



भगवान न तो अहंकार को पसंद करते हैं और न ही अहंकारी को। प्रभु की कृपा पाने और अपने जीवन को सहजतापूर्वक चलाने के लिए अहंकार रहित होना जरूरी है। जब हम अपनी सामाजिक पहचान को एक ओर रख कर और अपने आपको परमात्मा का रूप समझ कर स्वयं को उसका बच्चा समझकर किसी के पास जाते हैं तो हमें अपना काम करवाने के लिए किसी को कोई भी दलील देने अथवा कोई दावा पेश करने की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसे में परमात्मा स्वयं ही हमारे साथ चलता है और हमारा काम पूरा करवा देता है।



जब तक हम अपना अहंकार साथ लेकर चलते हैं तब तक हम भटकते ही रहते हैं। हमारा अहंकार हमारे लिए प्रभु कृपा के द्वार बंद कर देता है और हमें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। जब हमें अपनी भूल का एहसास होता है और हम अहंकार छोड़ कर चलना शुरू करते हैं तो परमात्मा की कृपा भी होने लगती है।