मान्यता है कि सूर्य देवता को रोजाना जल चढ़ाने से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है और वह दीर्घायु होता है। सारे जगत का निर्माण करने वाले ब्रह्माजी ने ही सूर्य की भी रचना की। 

सृष्टि के आरंभ में ब्रह्माजी के मुख से ऊं शब्द प्रकट हुआ। तब सूर्य का प्रारंभिक स्वरूप सूक्ष्म था। उसके बाद भू: भुव और स्व शब्द उत्पन्न हुए। ये तीनों पिंड के रूप में ऊं में विलीन हुए तो सूर्य को स्थूल स्वरूप मिला। 

इसके पश्चात ब्रह्माजी के चार मुखों से वेदों की उत्पत्ति हुई जो इस तेज रूपी ऊं स्वरूप में जा मिले। फिर वेद स्वरूप यह सूर्य ही जगत की उत्पत्ति, पालन व संहार के कारण बने। मान्यता तो यह भी है कि ब्रह्माजी की प्रार्थना पर ही सूर्यदेव ने अपने महातेज को समेटा व स्वल्प तेज को धारण कर लिया। 

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्माजी ने दाएं अंगूठे से दक्ष और बाएं अंगूठे से उनकी पत्नी को उत्पन्न किया। दक्ष के 13कन्याएं हुईं। दक्ष की तेरहवीं कन्या का विवाह ब्रह्माजी के पुत्र मारीचि से हुआ। मारीचि से कश्यप उत्पन्न हुए। जो सप्त ऋषियों में से एक हुए। 

कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। कश्यप और अदिति से उत्पन्न सभी पुत्र देवता कहलाए। कश्यप की दूसरी पत्नी दिति से दानव उत्पन्न हुए। दानव सदैव देवताओं से लड़ते रहते थे। 

एक बार दैत्य-दानवों ने देवताओं को भयंकर युद्ध में हरा दिया। देवताओं पर भारी संकट आन पड़ा। देवताओं की हार से देवमाता अदिति बहुत दुखी हुईं। देवताओं के कल्याण के लिए वह सूर्यदेव की उपासना करने लगीं। उनकी तपस्या से सूर्यदेव प्रसन्न हुए और पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय पश्चात उन्हें गर्भधारण हुआ। गर्भ धारण करने के पश्चात भी अदिति कठोर उपवास रखती जिस कारण उनका स्वास्थ्य काफी दुर्बल रहने लगा। 

महर्षि कश्यप इससे बहुत चिंतित हुए और उन्हें समझाने का प्रयास किया कि संतान के लिए उनका ऐसा करना ठीक नहीं है। लेकिन अदिति ने उन्हें समझाया कि हमारी संतान को कुछ नहीं होगा ये स्वयं सूर्य स्वरूप हैं। समय आने पर उनके गर्भ से एक अंड उत्पन्न हुआ जिससे एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया और वह मर्तण्ड कहलाए। मार्तण्ड सूर्य के कई नामों में से एक है। यह देवताओं के नायक बने व असुरों का संहार कर देवताओं की रक्षा की। 

अदिति के गर्भ से जन्म लेने के कारण इन्हें आदित्य भी कहा गया है। पुराणों के अनुसार माघ मास की शुक्ल पक्ष कीसप्तमी तिथि को सूर्यदेव की रोशनी पहली बार पृथ्वी पर पड़ी।