नई दिल्लीः खुदरा महंगाई दर और औद्योगिक उत्पादन दर में कमी आयी है. हालांकि खुदरा महंगाई दर अभी भी पांच फीसदी के ऊपर के स्तर पर बनी हुई है जबकि औद्योगिक उत्पादन दर सात फीसदी के करीब आ गयी.



जनवरी के लिए खुदरा महंगाई दर 5.07 फीसदी रही जबकि दिसंबर में ये दर 5.21 फीसदी थी. दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन बढ़ने की दर 7.1 फीसदी रही जबकि नवम्बर में ये दर 8.8 फीसदी दर्ज की गयी थी.



खुदरा महंगाई दर के पांच फीसदी के ऊपर बने रहने का मतलब ये है कि रिजर्व बैंक गवर्नर की अगुवाई वाली मौद्रिक नीति समिति कर्ज नीति की अगली समीक्षा में नीतिगत ब्याज दर बढ़ा सकती है. चूंकि घटने के बावजूद औद्योगिक उत्पादन दर अभी भी सात फीसदी के करीब बनी हुई है, ऐसे में उद्योग को बढ़ावा देने वाली दलील को भी खारिज करना संभव हो सकेगा. तकनीकी तौर पर मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक अप्रैल में होने के आसार हैं.



खुदरा महंगाई दर

सांख्यिकी मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों पर गौर करें तो खुदरा महंगाई दर भले ही घटी हो, लेकिन फल और सब्जियों में अभी भी आग लगी हुई है. जनवरी के महीने में सब्जियों की खुदरा महंगाई दर 26.97 फीसदी दर्ज की गयी, वहीं फल के मामले में ये दर 6.24 फीसदी रही. वहीं अंडों के लिए खुदरा महंगाई दर 8.7 फीसदी देखने को मिली. वो तो दाल ने रसोई घर के बजट को राहत देने का सिलसिला जारी रखा. दाल की खुदरा महंगाई दर में (-)20.19 फीसदी रही. इसके अलावा मसालों की भी महंगाई में कमी देखने को मिल रही है. कुल मिलाकर खाने पीने की खुदरा महंगाई दर 4.96 फीसदी से घटकर 4.7 फीसदी पर आ गयी जिसका असर पूरे खुदरा महंगाई दर पर देखने को मिला.



खुदरा महंगाई दर नीतिगत ब्याज दर की समीक्षा का प्रमुख आधार है. सरकार और रिजर्व बैंक के बीच हुए समझौते के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर को 4 (+/-2) फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य है. दूसरे शब्दों में खुदरा महंगाई दर की निचली सीमा दो फीसदी और ऊपरी सीमा छह फीसदी होनी चाहिए, लेकिन चार फीसदी के ऊपर के स्तर से रिजर्व बैंक असहज हो जाता है. इसके ऊपर यदि महंगाई दर बढ़ने की संभावना प्रबल हो तो रिजर्व बैंक नीतिगत ब्याज दर कमी नहीं करने की वकालत करता है. वहीं अगर ये लगातार पांच फीसदी के ऊपर बना रहे और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल नहीं हो तो वो नीतिगत ब्याज दर बढ़ाने के भी संकेत दे सकता है.



औद्योगिक उत्पादन दर

दिसंबर के महीने के लिए औद्योगिक उत्पादन दर भले ही नवंबर के मुकाबले कम हो गयी हो, लेकिन जानकारों की माने तो सात फीसदी से ऊपर की दर को कमतर नहीं आंका जा सकता. सबसे अहम बात ये है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर यानि विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर 8.4 फीसदी रही जबकि नवंबर में ये दर पौने ग्यारह फीसदी के करीब था. इस ऊंची दर की एक वजह 2016 में आधार निचला होना है. फिर भी इस तरह की बढ़ोतरी का एक मतलब ये हुआ कि विनिर्माण क्षेत्र जीएसटी औऱ नोटबंदी के असर से ऊबरता हुआ दिख रहा है. साथ ही इसका ये भी मतलब हुआ कि रोजगार के ज्यादा से ज्यादा मौके बनेंगे.



औद्योगिक उत्पादन की दर सात फीसदी तक पहुंचाने में सीमेंट और बिजली की अहम भूमिका तो रही ही, साथ ही दोपहिया वाहनों ने भी रफ्तार बढ़ी. दोपहिया वाहनो की उत्पादन बढ़ने का मतलब ये हुआ कि ग्रामीण इलाकों में मांग बढ़ रही है और ये अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है.