'शिव का अर्थ है-कल्याण या भलाई। शिव विश्व के कल्याणकर्ता यानी भलाई करने के देव हैं। संसार के सभी धर्मों में भगवान शिव का स्थान सबसे अलग और अति विशेष है। इसी प्रकार 'शंकर" का अर्थ है-मिलकर, मिला-जुला या समन्वयकारी। इस प्रकार शिव विश्व कल्याण के लिए समन्वय के महादेव हैं। शिव का स्वरूप ही समस्त विरोधों में तालमेल का है।

जैसे-शिव की जटाओं में जल तत्व का प्रतीक गंगा है, तो ललाट पर अग्नि का प्रतीक तीसरा नेत्र है। जटाओं में-अमृत का प्रतीक चंद्रमा है, तो गले में हलाहल या विष का प्रतीक नाग भी है। चंदन है तो गले में हलाहल या विष का प्रतीक नाग भी है। चंदन है तो भभूत भी है।


डमरू की मधुर ध्वनि है तो त्रिशूल की शक्ति भी है। इसी प्रकार शिव की जीवन लीलाओं में भी विचित्र विरोधाभास है। शिव स्वयं में देवाधिदेव महादेव हैं तो शिव विष्णु के अवतार राम के परम भख्त भी हैं। शिव योगी भी हैं और भोगी भी। शिव श्मशानवासी परम योगी भी हैं तो गृहस्थ के आदर्श भोगी भी हैं। इसी प्रकार शिव का पूरा परिवार भी है।


शिव का वाहन वृषभ (बैल) है तो शिवा-भवानी का वाहन शेर है। शिव-पुत्र गणेशजी मूषक पर सवार है और कार्तिकेय मयूर पर। वृषभ और शेर, मूषक और सर्प, सर्प और मयूर इन सबमें प्राकृतिक शत्रुता है, जन्मजात बैर है और एक-दूसरे के कुदरती आहार है।


इतना सब कुछ होने पर भी इन सबमें सामंजस्य है। प्राणी-मात्र में वैर-वैमनस्य के बीच सौहाद्र और सद्भावना के शिव सदा प्रेरक रहे हैं। यही कारण है कि बेर (एक प्रकार का फल) शिव को प्रिय है और शिवरात्रि पर शिव को अर्पित भी किया जाता है।


यह कितने आश्चर्य की बात है कि शिव-देव और दानव दोनों के सदा से ही आराध्य रहे हैं। वे राम के द्वारा भी उतने ही पूजनीय है जितने रावण द्वारा। शिव ने देवताओं को भी दुर्लभ वरदान दिए तो दानवों को भी वर देकर उपकृत किया। वे प्राणी मात्र के आराध्य और साध्य रहे हैं।


शिव-लिंग पूजा 


समस्त संसार में 'शिव-लिंग" ही पूजनीय है। अन्य किसी भी देव का लिंग-पूजन नहीं होता। इस तथ्य के पीछे भारतीय धर्म-संस्कृति और समाज का गहन चिंतन और वैज्ञानिक आधार भी है।


1. जीव-विज्ञान की दृष्टि से यह सत्य सम्मत और वैज्ञानिक तथ्य है कि लिंग जीवन चक्र का आधार है। प्राणियों के सृष्टि, प्राणीमात्र के जीवनानंद की चरम परिणति, जीवन-चक्र की स्थापना, दांपत्य भाव आदि कितनी ही दृष्टि से लिंग की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता है। प्राणी के जीवन की संपूर्णता और समरसता लिंग ही है।


2. लिंग का संबंध 'काम" से है और 'काम" का संबंध जीवन चक्र से है। भारतीय संस्कृति ने 'काम" का स्वरूप वासना या भोग से कभी भी नहीं जोड़ा। 'काम" के सांसारिक स्वरूप को दिव्यता और सम्पूर्णता की पराकाष्ठा से संबद्ध किया है। चूंकि शिव ने ही 'काम" का अपने तीसरे नेत्र ने संहार किया था इसलिए और इस अर्थ में भी लिंग पूजन का महत्व बदल जाता है।


'कामदेव के संहार" का प्रसंग अपने आप में गहन प्रतीकात्मकता रखता है। 'काम" ने 'शिव" के भीतर वासना का उद्दीपन करना चाहा था। 'वासना" या 'काम" की सार्वजनिकता मानव जीवन को मर्यादित और संतुलित करने की दृष्टि से सर्वथा घातक है। शिव ने काम के इस रूप को, वासनान्धता की इस घोर दशा को भस्म कर सामाजिक जीवन के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त किया था।


हमारी संस्कृति में 'काम" के महत्व और मानव जीवन में उसके स्थान को नकारा नहीं गया है, बल्कि उसे जीवन उपयोगी आवश्यकता मानकर उसका उदात्तीकरण और मान-मर्यादा से जोड़कर वर्जना का आवरण चढ़ाया गया है।


जिस तरह यूनान में 'वीनस" को सौंदर्य की देवी माना गया है, उसी तरह भारतीय संस्कृति में 'रति" और 'काम" को भी देवी-देवता के रूप में स्वीकारा गया है। काम ने शिव के भीतर वासना जागृति के प्रयोजन से उनकी योग-साधना भंग करने का प्रयास किया था-अत: शिव द्वारा उसको भस्म किए जाने का प्रसंग अपने आप में आज भी मानव जीवन को सजग करता है।


उस युग में अन्यान्य देव जैसे इंद्र आदि वासना तृप्ति के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक संतुलन का उल्लंघन कर रहे थे तो 'काम" की व्यग्रता में ऋषि-मुनियों और आम मनुष्यों की वासनासक्ति भी कुछ कम नहीं थी। ऐसे समय शिव ने भविष्य के जीवन को मर्यादित करने के लिए 'काम" के इसी रूप को भस्म किया था।


3. शिव के त्रिनेत्र है। त्रिनेत्र जहां शक्ति का केंद्र बिंदू हैं, वहीं त्रिनेत्र भविष्यकाल के जीवन को देखने का भी साधन और आधार हैं। संभवत: शिव ने काम के वासनांध रूप का भविष्य पर प्रभाव देख लिया होगा। यही कारण है कि उनके द्वारा काम को भस्म किया गया।


देखा जाए तो शिव की समाधि को भंग करने या शिव को परम लक्षय से विचलित करने के लिए कामदेव ने वासना का उद्दाम दृश्य उपस्थित कर दिया था। शिव पुराण और रामचरित मानस ने काम-देव के बाण के प्रभाव का जो वर्णन है उसमें वासनांधता का वह दृश्य है, जो निंदनीय ही नहीं जीवन की विकृति को उभारने वाला है। उस समय वह आज के 'खुले" रूप से भी बदतर था।


शिव ने काम को भस्म तो किया ही लेकिन सांसारिक कल्याण की दृष्टि से 'रति" को वरदान देकर काम को अनंग यानी अदृश्य या मान-मर्यादा के शालीन और समाज-सार्थक रूप से गोपनीय भी कर दिया।


शिवरात्रि


शिव यद्यपि स्वयंभू या शम्भू हैं वे गुणातीत सर्वेश्वर और जन्म से परे हैं। भगवान सर्वेश्वर होते हुए भी इस पृथ्वीलोक में स्वयंभू के रूप में अवतरित हुए। अत: पृथ्वीलोक में इसी रूप में शिव को मान्यता मिली। यह भी आश्चर्य की बात है कि शिव के साथ 'रात्रि" शब्द जुड़ा है। कृष्ण के साथ अष्टमी और राम के साथ नवमी की तिथि आती है। शिवरात्रि की तिथि चतुर्दर्शी है, जो अमावस्या के एक दिन पहले आती है। इसके पहले भी त्रयोदशी की तिथि शिव के प्रदोष व्रत से जुड़ी है। समस्त भू-मंडल के अंधकार में चंद्रमा का आकार वही है जो ईद के चांद का है। शिव की रात्रि अंधकार से प्रकाश की प्रेरणा प्रदान करती है।


शिवरात्रि शिव और शक्ति के विवाह के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। यद्यपि शिव को अनादि-अनंत माना जाता है, तथापि कुछ आख्यानों में यह माना जाता है कि शिवरात्रि के दिन शिव का जन्म हुआ है। शिवरात्रि के संदर्भ में एक मान्यता यह भी है कि इसी दिन शिव ने विष-पान किया था।


शिवरात्रि व्रत के संदर्भ में शिव पुराण में बहुत ही रोचक और मार्मिक आख्यान आता है। इस दिन एक शिकारी अपने भूखे परिवार के लिए आहार की खोज में तालाब के किनारे गहन जंगल में जाता है। पानी की मशक भरकर वह धनुष-बाण लेकर एक बिल्व पत्र के पेड़ पर चढ़ जाता है।


एक-एक कर उसके पास तीन हिरण आते हैं, जैसे ही वह धनुष पर बाण को लक्षय करने के लिए चढ़ाता है इससे मशक से पानी झलकता है और कुछ बिल्व पत्र नीचे गिर जाते हैं। वहां कोई पुरानी-सा शिवलिंग था।


चूंकि उस दिन शिवरात्रि थी, इसलिए सहज और अनजाने में ही भगवान शिव ने इसे अपनी आराधना समझ विधिवत पूजा का फल उस शिकारी को दे दिया। इतना ही नहीं, भगवान शिव ने उस शिकारी को प्रन्यक्ष दर्शन देकर निषादराज गुह बनाया। निषादराज गुह ने श्री राम के परम मित्र बनने का देव दुर्लभ वरदान प्राप्त किया था। शायद इसी सहज कृपा से शिव को आशुतोष, अवढरदानी, भोले-भंडारी के नाम से जाना जाता है।