जबलपुर। एक हत्यारा किसी व्यक्ति के केवल शरीर को नष्ट करता है, लेकिन एक बलात्कारी असहाय महिला की आत्मा को ही हिला देता है, उसके समूचे व्यक्तित्व का नाश कर देता है। इसीलिए बलात्कार के मामले में फैसला सुनाते समय अदालत अत्यधिक संवेदनशीलता बरतते हुए नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाती है। अपराध की प्रकृति और पीड़ित व उसके परिवार की आत्मा पर हुए आघात को देखते हुए यह सजा जरूरी है।

पनागर में 6 वर्षीय मासूम से दुष्कर्म के मामले में सुनाया फैसला


दशम विशेष न्यायाधीश (पास्को) पीसी गुप्ता की अदालत में राज्य की ओर से जेएस चौधरी ने पक्ष रखा। उन्होंने ट्रायल के दौरान दलील दी कि बड़ेरा पनागर निवासी आरोपी दिन्नू उर्फ दिनेश ने 2 दिसंबर 2014 की रात 10 बजे टॉयलेट के लिए घर से बाहर निकली 6 वर्षीय मासूम बच्ची का अपहरण कर उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया था। फिर वह बच्ची को नहर की तरफ ले गया और वहां दुराचार किया। घटना के बाद आरोपी बच्ची को मौके पर ही छोड़कर भाग निकला। पीड़ित बच्ची किसी तरह घर पहुंची और परिजन को घटना के बारे में बताया। जिसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा।


प्रायश्चित और भय की भावनाएं भी शामिल


दशम विशेष न्यायाधीश पीसी गुप्ता की अदालत ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा के पीछे अपराध के प्रति प्रायश्चित कराने के साथ-साथ बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के प्रति समाज में दंड का भय व्याप्त करने की भावना भी शामिल है। साथ ही पीड़ित बच्ची को प्रतिकर के रूप में 5 हजार रुपए अर्थदंड की राशि भी दिए जाने की व्यवस्था दी गई है।


रहम की गुहार मंजूर करने लायक नहीं


पॉस्को की स्पेशल कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए अपने फैसले में यह भी लिखा कि बलात्कारी की ओर से रहम की गुहार लगाते हुए यह कहा जाना कि वह नवयुवक है और यह उसका पहला अपराध था, महज इस आधार पर सजा के बिन्दु पर किसी तरह की नरमी बरते जाने का सवाल ही नहीं उठता।