इंदौर। रेल मंत्रालय मालवा और इसके आसपास 10 साल में लगभग 19,000 करोड़ रुपए की परियोजनाएं मंजूर कर चुका है। अंचल के लिए ये आठ बड़ी रेल परियोजनाएं मंजूर तो हैं, लेकिन काम केवल तीन योजनाओं का हो रहा है। बाकी योजनाएं सरकारी औपचारिकताओं, टेंडर और स्वीकृति की प्रक्रिया में झूल रही हैं। जिनका काम हो रहा है, सालों से वे चींटी की चाल से नहीं उबर पा रही हैं।


इंदौर-दाहोद और छोटा उदयपुर-धार रेल परियोजनाएं तो प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात से संबंधित हैं लेकिन उनके काम में भी मोदी सरकार कोई खास गति नहीं दिला पाई। दिलचस्प यह है कि इन दोनों के साथ रतलाम-खंडवा ब्रॉडगेज परियोजना का काम केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मंजूर किया था और मोदी सरकार इन योजनाओं पर ही काम कर रही है।


गुरुवार को पेश होने वाले केंद्रीय बजट में लोगों को परियोजनाओं के लिए पहले से ज्यादा बजट आवंटन की उम्मीद है। एक तो यह मोदी सरकार का आखिरी पूर्णरूपी बजट होगा और दूसरा केंद्र में मध्यप्रदेश के जनप्रतिनिधियों का तगड़ा दखल है। परियोजनाओं को जितनी ज्यादा राशि मिलेगी, काम तेजी से करने की संभावना उतनी बढ़ेगी। पिछले बजट में मालवा-निमाड़ की परियोजनाओं को अपेक्षाकृत अच्छी राशि मिली थी, लेकिन इसका असर कार्यों पर नहीं हुआ।


इंदौर-मनमाड़, इंदौर-जबलपुर नई रेल लाइन, इंदौर-देवास-उज्जैन लाइन का दोहरीकरण, लक्ष्मीबाई नगर-फतेहाबाद-रतलाम लाइन का विद्युतीकरण और फतेहाबाद चंद्रावतीगंज-उज्जैन रेल मार्ग को छोटी से बड़ी लाइन में बदलने का काम पिछले बजट में स्वीकृत होने के बावजूद जमीन पर नहीं उतरा। इंदौर-दाहोद, छोटा उदयपुर-धार और रतलाम-महू-खंडवा-अकोला ब्रॉडगेज परियोजना का काम तो कांग्रेस शासन में ही शुरू हो गया था लेकिन तब जैसी गति अब भी बरकरार है।


अब तक यह हुआ...


-इंदौर-दाहोद रेल लाइन प्रोजेक्ट के तहत इंदौर से टीही और दाहोद से कटवारा के बीच 50 किमी लंबे हिस्से में लाइन का काम हुआ है। टीही से धार होते हुए कटवारा के बीच अब तक काम की कोई गतिविधि शुरू नहीं हुई।


-छोटा उदयपुर-धार रेल लाइन प्रोजेक्ट में छोटा उदयपुर से मोटी सादली तक (23 किमी) लाइन बिछाई जा चुकी है। अप्रैल तक अंबारी होते हुए आलीराजपुर तक 50 किमी लंबे हिस्से में लाइन बिछेगी। इसके आगे धार की ओर काम की कोई गतिविधि नहीं है।


-इंदौर-मनमाड़ रेल लाइन प्रोजेक्ट पिछले बजट में मंजूर जरूर हुआ, लेकिन इस परियोजना को अब तक औपचारिक मंजूरी नहीं मिली। इस कारण काम शुरू नहीं हुआ।


-इंदौर-जबलपुर रेल लाइन को मंत्रालय मध्यप्रदेश सरकार के साथ मिलकर डालना चाहता है लेकिन दोनों पक्षों के बीच न तो सहमति बनी है, न एमओयू हुआ। इस प्रोजेक्ट का भी कोई काम शुरू नहीं हुआ।


-इंदौर-देवास-उज्जैन रेल लाइन के दोहरीकरण का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भी सरकारी प्रक्रियाओं में उलझा है। मंजूरी के बाद भी इसका कोई काम शुरू नहीं हुआ।


-रतलाम-महू-खंडवा-अकोला ब्रॉडगेज परियोजना का रतलाम से महू का काम पूरा हो गया। एक साल से खंडवा से सनावद के बीच (55 किमी) काम हो रहा है जिसे पूरा होने में एक साल लगेगा। रेलवे चाहता तो समय बचाने के लिए महू-खंडवा बड़ी लाइन का काम भी साथ-साथ कर सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया।


-लक्ष्मीबाई नगर-फतेहाबाद-चंद्रावतीगंज-रतलाम लाइन के विद्युतीकरण और फतेहाबाद-उज्जैन गेज कन्वर्जन प्रोजेक्ट भी सालभर बाद भी शुरू नहीं हुआ।


इस साल यह मिलना चाहिए क्षेत्र को


- लक्ष्मीबाईनगर-फतेहाबाद-रतलाम लाइन का दोहरीकरण।


- फतेहाबाद लाइन पर रतलाम से पहले नौगांवा से राधाकृष्ण नगर तक 15 किलोमीटर लंबे लिंक मार्ग का निर्माण ताकि इंदौर से मुंबई जाने वाली ट्रेन उक्त बायपास लाइन से रतलाम स्टेशन जाए बगैर निकल सकें।


- राऊ-महू के बीच रेल लाइन का दोहरीकरण और दाहोद लाइन के जंक्शन पर वाय सेक्शन का निर्माण ताकि दाहोद से खंडवा और खंडवा से दाहोद जाने वाली ट्रेन राऊ आए बगैर बिना इंजन की दिशा बदले गुजर सकें।


रेलवे के निर्माण विभाग की अक्षमता


बजट में अच्छी राशि मिलने के बावजूद उसका उपयोग नहीं हो रहा है। यह रेलवे निर्माण विभाग की अक्षमता है। कोई सांसद या मंत्री अफसरों के सिर पर बैठकर तो काम नहीं करा सकता। इसे तो खुद इंजीनियरों को करना होगा। पहले इंजीनियर कम फंड मिलने का रोना रोते थे लेकिन अब फंड पर्याप्त है तो उनके पास सही प्लानिंग नहीं है। इसके दो उदाहरण हैं। रतलाम-इंदौर गेज कन्वर्जन के साथ नौगांवा-राधाकृष्णनगर लिंक लाइन का निर्माण हो जाना था। इसी के साथ इंदौर से फतेहाबाद-रतलाम होकर नई दिल्ली की ओर जाने वाली ट्रेनों के लिए भी तभी लिंक लाइन डलना थी लेकिन अफसरों ने इस पर पहले ध्यान नहीं दिया। लगता है उनके पास आगे की कोई सोच ही नहीं है। - नागेश नामजोशी, सदस्य, रेलवे बोर्ड पैसेंजर एमिनिटीज कमेटी