स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा भले ही सरकार कर रही हो लेकिन हालात इससे इतर है और यही कारण है कि सरकारी स्कूलों के बारहवीं के बच्चे सामान्य ज्ञान के साधारण से सवालों का जवाब नहीं दे पाए.

राजधानी के 12वीं कक्षा के बच्चों को अपने राज्य के शिक्षा मंत्री तक का नाम पता नहीं है प्रदेश में कितने जिले और संभाग है ये भी नही पता. राष्ट्रपति का नाम तक बच्चे नहीं जानते. एनुअल स्टेट्स रिपोर्ट में भी एमपी के बच्चे सबसे फिसड्डी बताए गए हैं उन्हें कम्प्यूटर तक की जानकारी नहीं है.

एमपी में शिक्षा के क्या हालात है इसका नजारा दिखाने, हम आपको लिए चलते हैं राजधानी के बीचों बीच तुलसीनगर के कन्या हायर सेकेण्डरी स्कूल, जहां 12वीं कक्षा की छात्राओं को सामान्य ज्ञान इतना कमजोर है कि वे साधारण से सवालों का जवाब नही दे पाईं.

उन्हें देश के राष्ट्रपति, प्रदेश के शिक्षा मंत्री, भोपाल के सांसद तक का नाम पता नहीं है और तो और वे ये भी नहीं बता सकीं कि एमपी में कितने जिले और संभाग हैं. छात्राओं की नजर में भारत के प्रधानमंत्री प्रणव मुखर्जी हैं तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी है. भोपाल के सांसद आलोक शर्मा हैं. एमपी 640 जिले हैं.

राजधानी के दूसरे सरकारी स्कूल राजधानी के कस्तूरबा कन्या हायर सेकेण्डरी स्कूल की 10 वीं की छात्राओं को कम्प्यूटर की नॉलेज तक नहीं है. उनका कहना है कि वे कम्प्यूटर चला नहीं पाती. कम्प्यूटर शिक्षा देने के सरकार के दावे राजधानी के स्कूलों में ही फेल दिखाई दे रहे हैं तो बाकि जगह क्या हाल होगा. असर की रिपोर्ट में भी यही कहा गया है कि 69.8 फीसदी छात्राओें ने कभी कंप्यूटर ही नहीं चलाया.

सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग भी मानते हैं कि कहीं न कहीं अधिकारियों की लापरवाही है जिसके चलते सरकारी स्कूलों के बच्चे पढ़ाई के साथ साथ सामान्य ज्ञान के मामलों में पीछे हैं. सरकार की मॉनीटरिंग भी कमजोर है. इसके लिए नए सिरे से प्लान बनाना पड़ेगा. तभी शिक्षा का स्तर ऊपर उठ पाएगा.

बहरहाल यदि बजट की बात करें तो एमपी में शिक्षा का बजट 29 हजार 665 करोड़ का है जो कृषि के बाद सबसे ज्यादा है. लेकिन इतनी भारी भरकत राशि खर्च होने के बावजूद शिक्षा के स्तर में कोई सुधार दिखाई नहीं दे रहा है.