भोपाल। प्रदेश सरकार आदि शंकराचार्य के जीवन और उनके दर्शन को लेकर एकात्म यात्रा निकाल रही है। अब उनकी जीवनी को 11वीं हिंदी विशिष्ट की किताब में पढ़ाया जाएगा ताकि छात्र भी उनके दर्शन को जान सकें। नए शिक्षण सत्र के लिए प्रकाशित हो रही किताब में उनका पाठ शामिल किया जा रहा है।


अप्रैल से शुरू होने वाले शिक्षण सत्र में हिंदी विशिष्ट की किताब में आदि शंकराचार्य का पाठ जोड़ने के बाद अगले साल से इंग्लिश स्पेशल की किताब में भी उनका पाठ शामिल किया जाएगा। स्कूल शिक्षा विभाग ने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है। खास बात यह है कि अन्य विषयों की किताबें प्रकाशित होने के लिए चली भी गई हैं केवल हिंदी की किताब में उक्त पाठ को शामिल करने के लिए इसका प्रकाशन रोका गया था।


बाल्यकाल से मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ तक 


पाठ में आदि शंकराचार्य के बाल्यकाल से लेकर महेश्वर के प्रकांड विद्वान मंडन मिश्र तक से उनके शास्त्रार्थ को शामिल किया गया है। उनकी जीवनी (पाठ) को माध्यमिक शिक्षा मंडल के उपाध्यक्ष व पाठ्यपुस्तक स्थायी समिति के स्थायी सदस्य डा. भागीरथ कुमरावत ने लिखा है। इस पाठ को निबंध शैली में लिखा गया है। पाठ में बताया गया है कि कैसे शंकराचार्य ने आठ वर्ष की उम्र में गुरु की खोज के लिए अपनी माता से आज्ञा मांगी थी। माता से आज्ञा लेने के बाद वे बनारस गए थे।


उन्हें वहां एक संत मिले और उन्होंने शंकराचार्य से कहा कि वे ओंकारेश्वर जाएं उन्हें वहां कुमारिल भट्ट नाम के संत मिलेंगे वे ही उन्हें दीक्षा देंगे। इसके बाद वे ओंकारेश्वर आए। जब वे कुमारिल भट्टी की कुटिया में गए तब वे ध्यानमग्न थे। जब उनका ध्यान समाप्त हुआ तो उन्होंने देखा कि सामने एक बालक बैठा है। उन्होंने शंकराचार्य से पूछा कि वे कौन हैं ?


इस पर उन्होंने जवाब दिया कि 'अहं ब्रह्ास्मी" इसके बाद उन्होंने उन्हें दीक्षा दी और वेदों का ज्ञान दिया। इसके बाद उन्होंने देशाटन किया। बाद में उन्हें किसी ने बताया कि महेश्वर के मंडन मिश्रा वेदों के प्रकांड विद्वान हैं। वे उनसे शास्त्रार्थ करने जाएं। जब वे वहां पहुंचे तो उन्होंने कुछ महिलाओं से पूछा कि मंडन मिश्र कहां रहते हैं।


उन्हें बताया गया कि जिस घर में तोता-मैना संस्कृत में वेदों की बात करते नजर आएं समझना वही मंडन मिश्र का घर है। इसके बाद वे उनसे मिलने पहुंचे और उनसे शास्त्रार्थ किया। इसमें निर्णायक की भूमिका में मंडन मिश्र की पत्नी थी जो विदुषी महिला थीं। शास्त्रार्थ में शंकराचार्य ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद शंकराचार्य ने उनसे कहा कि हराने का तात्पर्य यह नहीं है कि वे उनके दास हो गए। उन्होंने मंडन मिश्र को श्रृंगेरी पीठ का पीठाधीश्वर बना दिया और वेदों का प्रचार प्रसार किया।


छात्रों को जानकारी देने का प्रयास


प्रदेश में आदि शंकराचार्य के दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए एकात्म यात्रा निकाली जा रही है। छात्रों को भी उनके बारे में जानकारी मिले इसके लिए इस साल से 11वीं की हिंदी विशिष्ट में आदि शंकराचार्य पर आधारित पाठ को शामिल किया जा रहा है। अगले साल से इंग्लिश की किताब में भी पाठ को शामिल करेंगे। 


डॉ.भागीरथ कुमरावत, उपाध्यक्ष, मप्र माशिमं