नई दिल्ली  भारत के साथ 4,057 किलोमीटर लंबी लाइन ऑफ ऐक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर चीनी सेना के अतिक्रमण के तरीकों में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। पहले चीनी सेना LAC के नजदीक अस्थायी ढांचे बनाती थी या भारत की ओर से बनाए गए अस्थायी ढांचों को नष्ट करती थी, लेकिन अब वह स्थायी ढांचे बनाने की कोशिश कर रही है।

जानकारों का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश में हाल ही में चीनी सेना के एक बुलडोजर के प्रवेश करने से यह संकेत मिला है। यह घटना पिछले वर्ष डोकलाम में हुए विवाद के जैसी है। डोकलाम के क्षेत्र पर भारत और भूटान दोनों अपना दावा जताते हैं और चीनी सेना के इसमें घुसपैठ करने से भारत और चीन के बीच 75 दिनों तक टकराव की स्थिति रही थी। बाद में राजनयिक जरियों से इस विवाद का अंत किया गया था। 


जानकारों का कहना है कि चीन का लक्ष्य LAC पर मौजूदा स्थिति में बदलाव करना है और इसी वजह से उसकी सेना भारतीय क्षेत्र के अंदर प्रवेश करने की कोशिश कर रही है। इससे चीन बाद में भारत के साथ सीमा को लेकर बातचीत में अपना पक्ष मजबूत कर सकता है। 


अरुणाचल प्रदेश की हाल की घटना चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का दोबारा जनरल सेक्रेटरी चुने जाने के बाद इस तरह का पहला विवाद है। चीनी सेना ने इस अतिक्रमण की कोशिश ऐसे समय में की थी जब उसके स्टेट काउंसलर यांग जिएची सीमा के मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधि बातचीत के 20वें दौर के लिए दिल्ली में थे। चीन के मामलों के विशेषज्ञ श्रीकांत कोंडापल्ली ने कहा, 'डोकलाम और अरुणाचल प्रदेश दोनों घटनाओं में चीन के अपनी सीमा के बाहर जमीन पर कब्जा करने की कोशिश हुई है और चीन को क्षेत्र या विपक्षी देश से फर्क नहीं पड़ता।' 


भारत और चीन के बीच सीमा के विवाद के केंद्र में अरुणाचल प्रदेश (90,000 स्क्वेयर किलोमीटर) का मुद्दा है। अरुणाचल प्रदेश को चीन 'दक्षिण तिब्बत' कहता है। चीन की मांग है कि अगर पूरा अरुणाचल प्रदेश नहीं तो कम से कम राज्य में तवांग का क्षेत्र उसे स्थानांतरित किया जाए। चीन ने तवांग को स्थानांतरित किए बिना सीमा विवाद के निपटारे की संभावना से इनकार किया है, लेकिन भारत यह स्पष्ट कर चुका है कि अरुणाचल प्रदेश को लेकर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। 


भारतीय अधिकारियों का कहना है कि तवांग पर भी कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने बताया कि चीन को कई बार यह स्पष्ट किया जा चुका है कि अरुणाचल प्रदेश का पूरा राज्य भारत का अहम हिस्सा है। चीन की दलील है कि छठे दलाई लामा सांगयांग ग्यात्सो का जन्म तवांग में होने के कारण यह क्षेत्र तिब्बती लोगों के दिलों और धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है और भारत को इस क्षेत्र पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए। मौजूदा दलाई लामा 1950 के दशक के अंत में तवांग के रास्ते भारत आए थे।