आंखों में कुछ नया करने के सपने और मन में एक आत्मविश्वास व उमंग के साथ हम आगे बढ़ कर नए साल का स्वागत करने को आतुर रहते हैं। पुराने साल की बीती बातों और असफलताओं को भुलाकर एक नए सिरे से अपने जीवन की एक नई शुरूआत करना चाहते हैं। देश-विदेश में नए साल के स्वागत के अपने-अपने तरीके हैं जिनके माध्यम से वे खुशी प्रकट करतेे हैं। अनेकता में एकता वाले हमारे राष्ट्र में विभिन्न धर्मों व संस्कृतियों से जुड़े लोगों का नया साल मनाने का ढंग तथा तिथियां बेशक अलग हों, लेकिन मतलब एक ही होता है। आने वाला साल सबके लिए सुख-शांति, समृद्धि और प्रेम से भरा हो।



भारत में नए साल का स्वागत 

हिंदू नववर्ष की शुरूआत हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष की पहली तिथि से होती है। जो आमतौर पर मार्च में होती है। विक्रमी संवत् से हिंदू नववर्ष का पंचांग माना जाता है व विक्रमी संवत् से ही वर्ष में 12 महीनों और हफ्ते में सात दिन का चलन प्रारंभ हुआ है।



उत्तर प्रदेश में इस दिन एक-दूसरे पर गुलाल छिड़कने की परंपरा है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को लोग नए कपड़ों में सजकर पूजा-अर्चना करते हैं व एक-दूसरे को नए साल की बधाई देकर मंगलकामना की प्रार्थना करते हैं। पूरा प्रदेश कई तरह के गुलाल में रंग कर नए साल का जश्न मनाता है। 



आंध्र प्रदेश में इस दिन को ‘उगादि’ के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने शरीर पर तेल से मालिश कराते हैं व आम, गुड़, नीम व गन्ने आदि से बना एक विशेष भोजन भी खाते हैं। इसका एक औषधीय महत्व है कि इसके सेवन से कभी चेचक नहीं होती। ‘उगादि’ वाले दिन घर के मुख्य द्वार को आम के पत्तों से सजाया जाता है। कई स्थानों पर कवि सम्मेलनों का आयोजन होता है ताकि नए कलाकारों को मौका मिल सके।



महाराष्ट्र इस दिन बांस को नई साड़ी पहना कर उस पर तांबे या पीतल के लोटे को रख कर गुड़ी बनाई जाती है व उसकी पूजा की जाती है।


 


तमिलनाडु में ‘पोंगल’ फसल काटने की खुशी में मनाया जाता है व इसीदिन नए साल की शुरूआत मानी जाती है जोकि प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को आता है। इस दिन सूर्यदेव को जो प्रसाद अॢपत किया जाता है उसे ‘पोंगल’ कहते हैं। चार दिन चलने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से सम्पन्नता को समर्पित है।


 


पंजाब में अप्रैल में वैसाखी का त्यौहार नए साल के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। किसानों की फसलें पकने और काटने की खुशी में, बड़ी गर्मजोशी से मेलों, रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों व लोकनृत्यों से भरे वातावरण में लोग खूब आनंद मनाते हैं।


कश्मीर में नए वर्ष की शुरूआत चैत्र महीने के पहले दिन से होती है जिसे ‘न वरेह’ कहते हैं। इसका मतलब है कि नए साल का अवतरण,  इस दिन लोग मंदिरों में अपने ईष्ट देवी-देवताओं की साज-सज्जा कर उनकी पूजा करते हैं। नए साल के दूसरे दिन विवाहित लड़कियों के यहां थाल में कई प्रकार की सामग्री, फूल और आभूषण सजा कर भेजने की भी प्रथा है। 



विदेशों में नए साल का स्वागत 

डेनमार्क में साल भर पुरानी प्लेटों को सिर्फ इसलिए बचा कर रखा जाता है ताकि नए साल पर इन्हें अपने दोस्तों व परिचितों के दरवाजों पर तोड़ कर नया साल आने की सूचना दी जाए।



ब्राजील के सभी शहरों खासतौर से रियो डी जेनेरो में नए साल की पूर्व संध्या पर मध्यरात्रि से ठीक आधा घंटा पहले ताबड़तोड़ आतिशबाजी शुरू होकर रात बारह बजे तक चलती है।  यहां शुभ शगुन के लिए सफेद पोशाक धारण करने की परंपरा भी है। स्थानीय लोग समुद्री लहरों से सात बार भीगते हुए फूल फैंकते हैं व समुद्र तट पर मोमबत्तियां भी जलाते हैं।



कोलंबिया में बीते समय की दुखद स्मृतियों से छुटकारा पाने व नए साल की शुभ शुरूआत के लिए ‘मि.ओल्ड यीअर’ नामक परंपरा के तहत रविवार को सभी सदस्य मिल कर एक बड़ा पुतला बनाते हैं जिसके अंदर पटाखों के साथ बीते वर्ष में परिवार के दुख का कारण बनी चीजों को रख कर पुतले को सभी सदस्यों के पुराने कपड़े पहना दिए जाते हैं और उसमें आग लगा दी जाती है।



ईरान में नववर्ष के आयोजन ‘नौरोज’ से 15 दिन पहले घरों में गेहूं व जौं बोए जाते हैं जिसमें नौरोज के दिन तक अंकुर निकल आते हैं व इस दिन सभी पारिवारिक सदस्य एक मेज के चारों ओर बैठते हैं वे बारी-बारी इन अंकुरों को जल से भरे पात्र में डालते हैं। इस पात्र के आसपास एक शीशा, अंडा, मोमबत्ती व एक रोटी रखी होती है। ऐसा करना शुभ माना जाता है।



कोरिया में यह दिन साल में दो बार ‘सौर वर्ष’ और ‘चंद्र वर्ष’ के अनुसार मनाया जाता है। इसे ‘सोल नल’ कहा जाता है और यह पूरे परिवार के आपस में मिल-बैठ कर हंसी-खुशी बांटने का दिन है।