रविवार दि॰ 31.12.17 पौष शुक्ल त्रयोदशी के उपलक्ष्य में रवि प्रदोष पर्व मनाया जाएगा। हर माह के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि परमेश्वर शिव को समर्पित है। त्रयोदशी तिथि सभी प्रकार के दोषों का नाश करती है इसी कारण इसे प्रदोष कहते हैं। सर्वप्रथम प्रदोष का ज्ञान भगवान शंकर ने देवी सती को बताया था। महर्षि वेदव्यास ने महर्षि सूत को बताया तथा गंगा तट पर महर्षि सूतजी ने सौनकादि ऋषियों को प्रदोष का ज्ञान दिया था। सूर्यास्त के बाद रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलता है। मान्यतानुसार प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। प्रदोष का पूजन वार के अनुसार करने का शास्त्रों में विधान बताया गया है। महर्षि सूत के अनुसार रवि प्रदोष व्रत करने से भगवान शंकर सदा नीरोगी रहने का आशीर्वाद देते हैं। रवि प्रदोष के व्रत, पूजन और उपाय करने से समस्त मनोरथों की पूर्ति होती है, कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा सदा निरोगी रहने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 



विशेष पूजन विधि: शिवालय जाकर शिवलिंग का विधिवत पूजन करें। गौघृत का दीप करें, सुगंधित धूप करें, बिल्वपत्र चढ़ाएं, लाल चंदन से त्रिपुंड बनाएं, अंजीर चढ़ाएं। गुड़ का भोग लगाएं तथा रुद्राक्ष माला से इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें।



पूजन मुहूर्त: शाम 17:34 से शाम 18:34 तक। (प्रदोष)

पूजन मंत्र: ह्रीं भगनेत्रभिदे नमः शिवाय ह्रीं॥


 


उपाय

मनोरथों की पूर्ति हेतु शिवलिंग पर घी शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं।



कष्टों से मुक्ति हेतु प्रदोष काल में शिवलिंग के समीप 8 दिशाओं में 8 दीपक लगाएं।


 


निरोगी काया हेतु शिवलिंग पर चढ़े 12 चौकोर तांबे के टुकड़े जल प्रवाह करें।