शनिवार दि॰ 30.12.17 को पौष शुक्ल बरस के उपलक्ष्य में कूर्म द्वादशी पर्व मनाया जाएगा। पौराणिक मतानुसार इंद्र ने अहंकारवश ऋषि दुर्वासा द्वारा दी गई बहुमूल्य माला का निरादर कर दिया। कुपित ऋषि दुर्वासा ने देवगणों को बलहीन, तेजहीन व ऐश्वर्यहीन कर दिया, जिससे देवगण अत्यंत निर्बल हो गए। मौका देखकर दैत्यराज बलि ने असुरों के साथ देवों पर आक्रमण कर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य जमा लिया। सभी देवगण श्रीहरि के पास पहुंचे। श्रीहरि ने उन्हें समुद्र-मंथन कर अमृत प्राप्त कर उसका पान करने को कहा। अमृत के लालच में असुरों ने देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन किया। क्षीर सागर में मंद्राचल पर्वत को मंथनी, वासुकि नाग को रस्सी बनाया। श्रीहरि ने कच्छप अवतार धारण कर मंद्राचल को अपनी पीठ पर स्थापित कर समुद्र मंथन आरम्भ किया। कूर्म अवतार के कारण ही समुद्र मंथन संभव हो पाया, जिसके फलस्वरूप निधियों व लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई व देवताओं को अमृत की प्राप्ति हुई। कूर्म द्वादशी के विशेष पूजन, उपाय व व्रत से शारीरिक बल में वृद्धि होती है, जीवन ऐश्वर्यवान बनता है तथा सामाजिक प्रकरम बढ़ता है। 



विशेष पूजन विधि: स्टील के लोटे में जल, दूध व तिल मिलाकर कलश स्थापित कूर्म अवतार का विधिवत पूजन करें। तिल के तेल का दीप करें, सुगंधित की धूप करें, सिंदूर चढ़ाएं, नीले फूल चढ़ाएं, रेवड़ियों का भोग लगाएं तथा किसी माला से इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें। पूजन के बाद भोग प्रसाद रूप में वितरित करें। 



पूजन मुहूर्त: प्रातः 08:45 से प्रातः 09:45 तक है।

पूजन मंत्र: ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:॥



उपाय

शारीरिक बल में वृद्धि हेतु कूर्म अवतार पर चढ़े बादाम का नित्य सेवन करें।



सामाजिक पराक्रम में वृद्धि हेतु कूर्म अवतार पर चढ़े उड़द जल प्रवाह करें।



ऐश्वर्यवान जीवन हेतु कूर्म अवतार पर चढ़ा श्रीफल किसी सन्यासी को भेंट करें।