बुधवार दि॰ 20.12.17 की संध्या पर पौष शुक्ल तृतीया व पूर्वाषाड़ा नक्षत्र होने के कारण देवी विशालाक्षी पूजन करना श्रेष्ठा रहेगा। देवीपुराण के अनुसार वाराणसी तीर्थ क्षेत्र में विशालाक्षी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मतानुसार यहां देवी सती की आंख व दाएं कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति देवी विशालाक्षी, शिव विशालाक्षेश्वर व भैरव 'काल भैरव' हैं। पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंगों के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे वहीं शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। इसी कारण इस स्थान को मणिकर्णिका घाट भी कहते हैं। मान्यतानुसार शिव वियोगी होकर सती के मृत देह को लेकर घूम रहे थे, तब सती का कर्ण कुण्डल यहीं गिरा था। अन्य मतानुसार देवी अन्नपूर्णा को ही विशालाक्षी कहा गया हैं। तंत्रसागर के अनुसार सदैव 16 वर्षीय दिखने वाली अत्यंत रूपवती विशालाक्षी गौरवर्णा हैं। उनके दिव्य विग्रह से तप्त स्वर्ण सदृश्य कांति प्रवाहित होती है। यह मुण्डमाल धारिणी रक्तवस्त्र पहनती हैं। इन्होंने दोनों हाथों में खड्ग व खप्पर धरण किया हुआ है। देवी विशालाक्षी के विशेष पूजन व उपाय से नजर दोष से मुक्ति मिलती है, धन की कमी दूर होती है व जेवरात पाने की इच्छा पूरी होती है।



पूजन विधि: महादेवी का विधिवत पूजन करें। नारियल तेल का दीप करें, सुगंधित धूप करें, गौरोचन से तिलक करें, मेहंदी अर्पित करें, पालक का पत्ता चढ़ाएं, भीगे हुए हरे मूंग पर मिश्री रखकर भोग लगाएं तथा किसी माला से 108 बार यह विशेष मंत्र जपें तत्पश्चात भोग गाय को खिला दें। 



पूजन मुहूर्त: शाम 19:20 से रात 08:250 तक।

पूजन मंत्र: ॐ षोडशस्वररूपिण्यै नमः ॥



उपाय

धन की कमी दूर करने हेतु महादेवी पर चढ़ा 5 रु का सिक्का पर्स में रखें।



जेवरात पाने हेतु महादेवी पर चढ़ी 11 साबूत सुपारी तिजोरी में स्थापित करें।



नजर दोष से मुक्ति हेतु पालक का गुच्छा सिर से वारकर काली गाय को खिलाएं।