दिल्ली से सदूर दक्षिण की ओर जाने वाली रेलवे की प्रमुख लाइन पर भोपाल से पहले विदिशा स्टेशन पड़ता है। पौराणिक और ऐतिहासिक काल में यही विदिशा चक्रवर्ती सम्राटों की राजधानी और क्रीड़ास्थली रही है। आज भी विदिशा के पचास वर्ग मील के क्षेत्र में इतनी अपार पुरातत्व सम्पदा भरी पड़ी है कि संसार के किसी अन्य क्षेत्र में ऐसी सामग्री ढूंढने को भी नहीं मिलेगी। इसी विदिशा से दक्षिण-पश्चिम में चार मील की दूरी पर सांची का वैभव पूर्ण क्षेत्र है जो अपने जगत प्रसिद्ध स्तूपों और मंदिरों पर उच्च कोटि के उत्कीर्णों के कारण संसार भर में प्रसिद्ध है। आज भी धर्म पिपासुओं, पर्यटकों और इतिहास के विद्वानों के लिए यह अपूर्व अध्ययन केंद्र है। यह तो सौभाग्य ही समझा जाना चाहिए कि इस स्थल की यह अपूर्व सामग्री भयंकर बीहड़ों, मिट्टी के बड़े-बड़े टीलों और पत्थरों के ढेरों में डेढ़ हजार वर्षों तक छिपी पड़ी रही, अन्यथा विदेशी आक्रमणकारी इन धरोहरों को भी अन्य स्थलों की भांति नष्ट कर डालते।


महेन्द्र की स्मृतियां : लगभग 91 मीटर ऊंची वृक्षों और लताओं से लदी हुई इस मनोरम गिरिमाला पर स्थल-स्थल पर पुरातत्व सामग्री बिखरी पड़ी हुई है। ईस्वी पूर्व तीसरी शती तक की शिल्पकलाओं का इसमें विशाल भंडार है। वैदिस अथवा विदिशा के कारण बौद्ध साहित्य में इसे वैदिस-गिरि कहा गया है।


सांची के जन्म का प्राचीन इतिहास तो नहीं मिलता पर अशोक काल से पहले यहां छोटी-मोटी आठ स्तूपनुमा ढेरियां थीं। इनमें से सात को अशोक ने खुलकर उनसे प्राप्त धातु सामग्री को अपने विशाल साम्राज्य में सहस्त्रों स्तूपों में रखकर सुरक्षित कर दिया। स्तूप नं. 1 की वेदिका के एक लेख (सन् 412-413 ई) तथा गुप्त काल के एक लेख (सन् 450-451 ई.) के अनुसार सांची का प्राचीन नाम काकानाद वोट था जो आजकल बिगड़कर कानाखेड़ा कहलाता है। इस स्थल की र्कीत एक धार्मिक अनुष्ठान के कारण फैली। महावंश के अनुसार सम्राट अशोक का पुत्र महामहेन्द्र विदिशा निवासी श्रेष्ठि की पुत्री तथा अपनी माता महादेवी (असंधिमित्रा) से मिलने विदिशा आया तो उसकी माता उसे वैदिस-गिरि में बनाए गए अपने मंडप कुंज में ले गई और उसको चीवर और पात्र देकर सिंहल द्वीप के लिए विदा किया। भारत के महान सुपुत्र का अपनी माता से यह अंतिम मिलन था। इस स्मृति में यहां संघारामों और महान स्तूपों की नींव पड़ी। अपनी सिंहल यात्रा के पूर्व महेन्द्र इस गिरि के संघाराम में एक मास तक ठहरे रहे। सम्राट अशोक ने अपनी प्रिय पत्नी की इच्छानुसार इस स्थान पर एक स्तूप और एकाश्म का निर्माण कराया।


सांची के दान पत्रों के उल्लेखों से पाया जाता है कि इसके समीप में उत्तर से दक्षिण, और पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले प्रमुख मार्गों के संगम पर बसा विदिशा उस समय अपने व्यापारिक शिखर पर था।


वैष्णव राजाओं का योगदान : सांची के वैभव निर्माण में केवल बौद्धों का ही नहीं अपितु विदिशा के वैष्णव धर्मावलम्बी महान शुंग सम्राटों का भी कम योगदान नहीं रहा। ईसा पूर्व दूसरी शती के उनके उत्कर्ष काल में अशोक-स्तूप का सम्वर्धन कराया गया। उस पर पक्की ईंटों का आवरण चढ़ाया गया तथा चारों ओर की भू वेदिका, मेधि, सोपान एवं हर्मिका का निर्माण हुआ। उनके समय में ही 40 नं. के मंदिर तथा  स्तूप नं. 2 व 3 का निर्माण हुआ। प्रथम शती के आसपास आंध्र के सातवाहन राजाओं के समय में स्तूप नं.1 व 3 को तोरण द्वारों से अलंकृत किया गया।


सन् 1818 में सर्वप्रथम जनरल टेलर ने इस स्थान की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट किया। धूल मिट्टी से ढंके खंडहरों में से उसे तीन स्तूप पूर्ण अवस्था में मिले। उस समय आसपास की जनता इसे मामा-भांजे की बारात (जो देव प्रकोप से पत्थर की हो गई थी) समझते थे। अतएव भूमिगत खजाने की लालसा ने इन सामग्रियों को बहुत क्षति पहुंचाई। चार वर्ष बाद भोपाल के असि. पोलिटिकल एजैंट ने इसे खुलवाकर और भी हानि पहुंचाई। इनको वर्तमान उन्नत स्वरूप देने का श्रेय एलैग्जैंडर कक्षिनघम को है जिसने सन् 1851 में खुदाई कराकर इनकी सही-सही जानकारी दी। सन् 1912 में पुरातत्व विज्ञ मार्शल ने स्मारकों को वर्तमान स्वरूप देकर उस पर महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की।


इन स्तूपों को अलंकृत और सज्जित करने में विदिशा के दानशील व्यक्तियों का सर्वाधिक योगदान रहा है। स्थान-स्थान पर ब्राह्यी लिपि में प्रस्तरों पर इन विदिशा वासियों के नाम खुदे हुए हैं।



वैष्णव मंदिरों की मूर्तियां गुप्त संवत 131(450-451 ई. में) स्थापित कर दी गई प्रतीत होती है। नृपति हर्ष के शासनकाल में सांची की अभूतपूर्व उन्नति हुई। अनेक संघाराम और शालाओं के निर्माण हुए। बौद्धों के वज्रयान संप्रदाय की व्रजसत्व, मारीची, तारा और लोकेश्वर की मूर्तियों की भी इसी काल में स्थापना की गई।



इतिहास एवं संस्कृति की झलक : स्तूप निर्माण काल के समय भारत का अन्य देशों के साथ सम्पर्क और संबंधों पर भी प्रकाश पड़ता है। पारिचारिकाओं के यूनानी ढंग से कटे हुए बाल, महीन वस्त्रों का विदेशी पहनावा तथा सीरिया और ईराक देशों में पाए जाने वाले दो कूबड़ वाले ऊंटों को कई स्थानों पर उत्कीर्ण किया गया है। इस स्तम्भ के निम्र भाग में एक पुरुष को पाजामा पहने बतलाया गया था पर खेद है कि उचित रख-रखाव के अभाव में यह दृश्य मौसमी प्रकोप से नष्ट हो गया।



तत्कालीन सामाजिक दशा का सांची स्तूपों में अंकन पाया जाता है। उस समय के पुरुष पहनावे में विशेष प्रकार की पगड़ी, धोती, अंग वस्त्र एवं मोती में रत्न जटित हार, कानों में बालियां और हाथों में कंकण पहनने की आम परिपाटी थी।



ग्रामीण व्यवस्था और नागरिक जीवन की अद्भुत झांकियां प्रदर्शित की गई है। सन् 1952 में जब श्यामाप्रसाद मुखर्जी महाबोधि सोसायटी के अध्यक्ष थे तो सांची में एक विराट बौद्ध सम्मेलन हुआ। इसमें पूर्वी देशों के प्राय:  सभी राष्ट्राध्यक्षों ने भाग लिया था। इस अवसर पर ब्रिटिश म्यूजियम से इन दोनों स्तूपों के धातु वापस लाए गए। इस समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू तथा तत्कालीन उपराष्ट्रपति डा. राधा कृष्णन ने भी भाग लिया था। उस समय सांची की उत्कृष्ट कला की प्रशंसा करते हुए डा. राधा कृष्णन ने कहा था कि सांची के तो पत्थर बोलते हैं।