भुवनेश्वर। एशियाई हॉकी की सिरमौर भारतीय टीम शुक्रवार से जब यहां शुरू हो रहे विश्व हॉकी लीग फाइनल के तीसरे और आखिरी सत्र में उतरेगी तो उसका इरादा दुनिया की दिग्गज अंतरराष्ट्रीय टीमों के बीच अपनी छाप छोड़ने का होगा।

 

भारत हॉकी विश्व लीग फाइनल में पूल बी में पिछले चैंपियन और विश्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहला मैच खेलेगा। कुछ मैचों को छोड़ दें तो उपमहाद्वीप में भारतीय टीम का दबदबा रहा है। हाल ही में ढाका में भारत ने एशिया कप में खिताबी जीत दर्ज की।

 

आठ बार के ओलिंपिक चैंपियन भारत के पास इस टूर्नामेंट के जरिये यह साबित करने का सुनहरा मौका है कि उसमें एशिया के बाहर भी अपना दबदबा कायम करने का माद्दा है।

 

दुनिया की दूसरे नंबर की टीम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत को पिछले कुछ समय में ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। ऑस्ट्रेलिया ने उसे चैंपियंस ट्रॉफी, अजलान शाह और राष्ट्रमंडल खेलों में मात दी थी। आठ देशों के इस टूर्नामेंट में पहले ही मैच में ऑस्ट्रेलिया के रूप में भारत को सबसे कठिन चुनौती मिली है।

 

भारत के नए कोच शोर्ड मारिन की भी यह पहली असली परीक्षा होगी, जिन्होंने दो महीने पहले ही रोलैंट ओल्टमैंस की जगह ली है। मारिन एशिया कप में कामयाब रहे, लेकिन हॉकी लीग फाइनल उनके लिए बिल्कुल अलग चुनौती होगी। ओल्टमैंस को हटाते समय भारतीय हॉकी के हुक्मरानों ने स्पष्ट कर दिया था कि एशियाई स्तर पर सफलता कोई मानदंड नहीं होगी और विश्व स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करना होगा।

 

पद संभालने के बाद मारिन ने टीम के खेलने की शैली और रणनीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है। इसके बजाय उन्होंने यह विचार रखा है कि खिलाड़ी अपनी शैली के मुताबिक मैदान में प्रदर्शन करें। उन्होंने निजी बातचीत के जरिये होने वाली तैयारी पर फोकस किया है, जिसमें खिलाड़ियों के कंधों पर ज्यादा जिम्मेदारी आ जाती है।

 

2018 एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और विश्व कप से पहले नए कोच के लिए हॉकी विश्व लीग फाइनल ऐसा मौका होगा, जहां वो टीम की मजबूती और कमजोरियों को जांच सकते हैं।